पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कानून जरूरी, लेकिन फ्रीलांस और ग्रामीण पत्रकारों को भी मिले संरक्षण

महाराष्ट्र में पत्रकारों पर हमले को गैर-जमानती अपराध बनाने का प्रावधान, कानून के दायरे और सजा को लेकर भी उठे सवाल
भोपाल । पत्रकार लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वे जनता की समस्याओं, सरकारी कामकाज और समाज से जुड़े मुद्दों को सामने लाते हैं। इस दौरान कई बार उन्हें धमकी, मारपीट और दूसरे तरह के दबाव का सामना करना पड़ता है। ऐसे में पत्रकारों की सुरक्षा के लिए प्रभावी कानून की जरूरत लंबे समय से महसूस की जाती रही है। महाराष्ट्र ने इस दिशा में पहल करते हुए पत्रकारों की सुरक्षा के लिए विशेष कानून बनाया था।
महाराष्ट्र विधानसभा के दोनों सदनों ने 7 अप्रैल 2017 को पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को हिंसा से बचाने के लिए विधेयक पारित किया था। इस कानून का उद्देश्य पत्रकारों को पेशेवर जिम्मेदारियां निभाते समय होने वाले हमलों से सुरक्षा देना और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित करना है।
हमले पर तीन साल तक की सजा का प्रावधान
महाराष्ट्र के पत्रकार संरक्षण कानून के तहत मीडियाकर्मियों और मीडिया संस्थानों के खिलाफ हिंसा को दंडनीय अपराध बनाया गया है। इसके अंतर्गत दोषी पाए जाने पर तीन साल तक की जेल, 50 हजार रुपये तक का जुर्माना या दोनों सजाएं दी जा सकती हैं। कानून में ऐसे मामलों को संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध के रूप में रखा गया है।
मामलों की जांच पुलिस उपाधीक्षक यानी डीएसपी रैंक से नीचे का अधिकारी नहीं कर सकता। दोषी को पत्रकार या मीडिया संस्थान की संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई और घायल पत्रकार के चिकित्सा खर्च का भुगतान भी करना पड़ सकता है। निर्धारित राशि का भुगतान नहीं होने पर उसे भू-राजस्व के बकाये की तरह वसूलने का प्रावधान है।
हालांकि, कानून में झूठी शिकायत करने वाले व्यक्ति के खिलाफ भी कार्रवाई का प्रावधान है। इसका उद्देश्य कानून के दुरुपयोग को रोकना है, लेकिन शिकायतों की निष्पक्ष जांच और पत्रकारों के संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है।
फ्रीलांस और ग्रामीण पत्रकारों के संरक्षण का सवाल
पत्रकार सुरक्षा कानून के दायरे को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या इसमें सभी प्रकार के पत्रकारों को पर्याप्त संरक्षण मिलता है। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले फ्रीलांस पत्रकारों और स्ट्रिंगर्स की स्थिति पर ध्यान देने की जरूरत है।
ग्रामीण पत्रकार अक्सर स्थानीय समस्याओं, अवैध गतिविधियों, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग करते हैं। कई बार उनके पास किसी बड़े मीडिया संस्थान का समर्थन, कानूनी सहायता या पेशेवर नेटवर्क नहीं होता। ऐसे में धमकी या हमले की स्थिति में उन्हें अकेले ही मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।
इसलिए पत्रकार सुरक्षा कानून बनाते समय यह स्पष्ट होना चाहिए कि नियमित वेतन पर काम करने वाले पत्रकारों के साथ-साथ अनुबंध पर काम करने वाले, स्वतंत्र पत्रकार और स्थानीय संवाददाता भी किस सीमा तक संरक्षण के पात्र होंगे।
डिजिटल मीडिया को लेकर स्पष्टता जरूरी
समाचारों के प्रसार का माध्यम तेजी से बदल रहा है। प्रिंट और टेलीविजन के साथ डिजिटल न्यूज पोर्टल तथा अन्य ऑनलाइन मंच भी पत्रकारिता का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में कानून में मीडिया संस्थानों और मीडियाकर्मियों की परिभाषा स्पष्ट होना जरूरी है, ताकि डिजिटल माध्यमों से काम करने वाले पत्रकारों को संरक्षण मिलने में कोई अनावश्यक बाधा न आए।
इसके साथ ही कानून की सजा और भारतीय दंड कानून के अन्य प्रावधानों के बीच तालमेल भी महत्वपूर्ण है। गंभीर चोट या हत्या के प्रयास जैसे मामलों में सामान्य आपराधिक कानून के प्रावधान भी लागू हो सकते हैं। इसलिए विशेष कानून और सामान्य आपराधिक कानून के बीच अंतर तथा उनके इस्तेमाल की स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।
सुरक्षा के साथ निष्पक्ष जांच भी जरूरी
पत्रकारों की सुरक्षा का अर्थ केवल हमले के बाद कार्रवाई करना नहीं है। इसमें शिकायत दर्ज कराने की आसान व्यवस्था, समय पर जांच, कानूनी सहायता और पीड़ित पत्रकार को उचित संरक्षण देना भी शामिल होना चाहिए।
ग्रामीण और स्वतंत्र पत्रकारों के लिए विशेष सहायता व्यवस्था, शिकायतों की निगरानी और जांच में जवाबदेही जैसे उपाय भी उपयोगी हो सकते हैं। साथ ही, कानून का इस्तेमाल किसी भी व्यक्ति को झूठे आरोप में फंसाने के लिए न हो, इसके लिए निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करना जरूरी है।
पत्रकारों की सुरक्षा लोकतांत्रिक व्यवस्था और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा विषय है। इसलिए ऐसा कानून जरूरी है, जो पत्रकारों को निर्भीक होकर काम करने का अवसर दे और साथ ही निष्पक्षता, जवाबदेही तथा कानून के दुरुपयोग से बचाव के सिद्धांतों का भी पालन करे।





