सामाजिक न्याय जरूरी है, लेकिन इतिहास को खांचों मेंबांटकर नहीं; जिस समाज पर सवाल उठे, उसी केलोगों नेकितनों केलिए अवसरों के दरवाजे खोले

लेखक : दीपक शर्मा
भारतीय राजनीति मेंनारों का अपना इतिहास है। कोई नारा व्यवस्था
बदलनेका दावा करता है, कोई सत्ता बदलनेका और कोई समाज
बदलनेका। लेकिन कु छ नारेऐसेभी होतेहैंजो सुननेमेंजितनेसरल
लगतेहैं, उनके पीछेके सवाल उतनेही जटिल होतेहैं। “ब्राह्मणवाद से
आजादी” भी ऐसा ही एक नारा है।
सामाजिक असमानता और जातिगत भेदभाव के खिलाफ आवाज
उठाना लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है। भारत का संविधान
समानता और सामाजिक न्याय की गारंटी देता है। लेकिन जब
सामाजिक न्याय की बहस किसी पूरेसमुदाय की पहचान तक पहुंच
जाती है, तब सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या हम व्यवस्था की
आलोचना कर रहेहैंया समाज के एक वर्गको सामूहिक रूप सेकठघरे
मेंखड़ा कर रहेहैं?यहीं सेइतिहास का आईना सामनेआता है।
ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद को एक तराजूमेंक्यों तौला जाए?
ब्राह्मण एक सामाजिक पहचान है, जबकि ब्राह्मणवाद एक विचार या
सामाजिक व्यवस्था सेजुड़ी अवधारणा के रूप मेंइस्तेमाल होता है।
दोनों को एक ही अर्थमेंदेखना इतिहास को सरल बनाना है।यदि
जातिगत भेदभाव गलत हैतो उसका विरोध होना चाहिए। यदि किसी
व्यवस्था मेंअसमानता हैतो उसेबदला जाना चाहिए। लेकिन किसी
व्यक्ति या व्यवस्था की गलती का भार पूरी जाति पर डाल देना किसतरह का न्याय है?व्यंग्य यही हैकि जाति मिटानेकी राजनीति करते-
करतेहम कई बार जाति को ही अपनी राजनीति का सबसेमजबूत
हथियार बना लेतेहैं।
इतिहास मेंके वल दोष खोजेंगेया योगदान भी देखेंगे?
भारतीय स्वतंत्रता आं दोलन और आधुनिक भारत के निर्माण का
इतिहास किसी एक सामाजिक समूह की कहानी नहीं है। इसमेंअलग-
अलग समुदायों के लोगों नेअपनी भूमिका निभाई।ब्राह्मण समाज से
आनेवालेबाल गंगाधर तिलक नेराष्ट्रीय चेतना को जन आं दोलन से
जोड़नेकी कोशिश की। गोपाल कृष्ण गोखलेनेसंवैधानिक राजनीति
और राजनीतिक शिक्षा की दिशा मेंकाम किया।
स्वतंत्र भारत मेंजवाहरलाल नेहरू नेआधुनिक संस्थाओंऔर वैज्ञानिक
दृष्टिकोण को महत्व दिया, जबकि राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के
अध्यक्ष और देश के पहलेराष्ट्रपति बने।इन नेताओ ंकी नीतियों और
विचारों पर बहस हो सकती है। उनके निर्णयों की आलोचना भी हो
सकती है। लेकिन क्या उनके योगदान को के वल जातीय पहचान के
आधार पर नकार देना इतिहास के साथ न्याय होगा?
जिसनेपढ़ाया, उसका हिसाब कौन रखेगा?
सामाजिक परिवर्तन के वल संसद और चुनाव सेनहीं आता। स्कूल,
कॉलेज, सामाजिक संस्थाएं, पत्रकारिता और व्यक्तिगत प्रयास भी
समाज को बदलतेहैं।
ब्राह्मण समाज सेजुड़ेअनेक शिक्षक, विद्वान, सामाजिक कार्यकर्ता
और प्रशासक ऐसेरहेजिन्होंनेअपनेआसपास के पिछड़ेऔर वंचित
वर्गों के लोगों को शिक्षा और अवसर उपलब्ध करानेमेंभूमिका निभाई।
किसी नेबच्चों को पढ़ाया, किसी नेनौकरी के लिए मार्गदर्शन दिया,
किसी नेसामाजिक सुधार का समर्थन किया और किसी नेसार्वजनिक
जीवन मेंदूसरेवर्गों की भागीदारी को प्रोत्साहित किया।
इन योगदानों को किसी समुदाय के लिए प्रमाणपत्र नहीं बनाया जा
सकता। लेकिन उन्हेंइतिहास सेमिटाना भी उचित नहीं।
क्योंकि अगर गलतियों का हिसाब जाति देखकर किया जाएगा तो
योगदान का हिसाब भी निष्पक्षता सेहोना चाहिए।
सामाजिक न्याय जरूरी है, सामाजिक बदला नहीं
भारत मेंसामाजिक न्याय की आवश्यकता निर्विवाद है। ऐतिहासिक
असमानताओ ंको दूर करना, पिछड़ेऔर वंचित वर्गों को अवसर देना
और राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाना लोकतंत्र की जिम्मेदारी है।
लेकिन सामाजिक न्याय और सामाजिक बदला अलग-अलग चीजेंहैं।
एक वर्गको आगेलानेके लिए दूसरेवर्गको पीछेधके लना न्याय नहीं
हो सकता। पिछड़ों को हिस्सेदारी मिले, दलितों और आदिवासियों को
अधिकार मिले, महिलाओ ंकी राजनीतिक भागीदारी बढ़े—यह लोकतंत्र
की उपलब्धि है।लेकिन इस पूरी प्रक्रिया का अंतिम लक्ष्य समान
नागरिकता होना चाहिए, स्थायी सामाजिक खेमेबंदी नहीं।
हिस्सेदारी का स्वागत, इतिहास का अपमान क्यों?
भारतीय राजनीति नेपिछलेदशकों मेंव्यापक सामाजिक परिवर्तन
देखा है। सत्ता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का आधार विस्तृत हुआ है।
ऐसेसमुदाय, जो पहलेराजनीति के केंद्र सेदूर थे, उन्होंनेअपनी
राजनीतिक ताकत बनाई।यह परिवर्तन भारतीय लोकतंत्र की सफलता
है।
लेकिन क्या नए राजनीतिक नेतृत्व को स्थापित करनेके लिए पुराने
सामाजिक समूहों के योगदान को नकारना जरूरी है?
शायद नहीं।
हिस्सेदारी बढ़ाइए, लेकिन इतिहास मत मिटाइए।
विडंबना यहीं है
जाति के खिलाफ आं दोलन होतेहैंऔर राजनीतिक मंच पर सबसे
पहलेजाति पूछी जाती है।समानता की बात होती हैऔर भाषण में
समाज के लिए नए खांचेतैयार हो जातेहैं।भेदभाव के खिलाफ संघर्ष
होता हैऔर कभी-कभी भाषा खुद भेदभाव का माध्यम बन जाती है।
यही राजनीति का सबसेबड़ा व्यंग्य है।
तो फिर आजादी किससे?
अगर “ब्राह्मणवाद सेआजादी” का अर्थजातिगत भेदभाव, सामाजिक
अन्याय और अवसरों की असमानता सेमुक्ति है, तो यह संघर्ष
आवश्यक है।लेकिन यदि इसका अर्थकिसी पूरेसमुदाय को दोषी
ठहराना है, तो सवाल यह हैकि इससेसामाजिक न्याय मजबूत होगा या सामाजिक दूरी।
भारत को ऐसी राजनीति की जरूरत हैजो कमजोर को मजबूत करे,
पिछड़ेको आगेलाए और वंचित को अवसर दे। लेकिन इसके लिए
किसी दूसरेसमुदाय को सामूहिक रूप सेअपराधी बनानेकी जरूरत
नहीं है।
इतिहास का आखिरी सवाल
ब्राह्मण समाज के योगदान को नकारकर भारत की राजनीतिक और
सामाजिक कहानी पूरी नहीं हो सकती।इस समाज सेआनेवालेलोगों
नेस्वतंत्रता आं दोलन मेंयोगदान दिया, शिक्षा और ज्ञान की परंपरा को
आगेबढ़ाया, प्रशासन और न्याय व्यवस्था मेंभूमिका निभाई,
पत्रकारिता और साहित्य को प्रभावित किया और स्वतंत्र भारत की
राजनीतिक संस्थाओंके निर्माण मेंहिस्सा लिया।और सबसेमहत्वपूर्ण
बात—हर योगदान सत्ता हासिल करनेके लिए नहीं था।अनेक लोगों ने
अपनेव्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर पिछड़े, गरीब और वंचित वर्गों
के बच्चों को पढ़ाया, उन्हेंआगेबढ़नेके अवसर दिए और सार्वजनिक
जीवन मेंप्रवेश के लिए रास्तेखोले।इसलिए इतिहास का सवाल के वल
यह नहीं होना चाहिए कि किसके पास सत्ता थी।सवाल यह भी होना
चाहिए कि किसनेकिसका हाथ पकड़ा और उसेआगेबढ़ाया।
भारत किसी एक जाति नेनहीं बनाया। किसी नेस्वतंत्रता के लिए
संघर्षकिया, किसी नेशिक्षा दी, किसी नेखेत मेंमेहनत की, किसी ने
कानून बनाया, किसी नेकलम उठाई और किसी नेदूसरेके लिए
अवसर का दरवाजा खोला।
यही भारत की असली शक्ति है।
इसलिए अगर आजादी चाहिए तो किसी जाति सेनहीं, जातिगत
पूर्वाग्रह सेआजादी चाहिए।क्योंकि लोकतंत्र की खूबसूरती यह नहीं
कि एक समुदाय दूसरेको हरा देलोकतंत्र की खूबसूरती यह हैकि
कल तक जो पीछेथा, वह आज आगेआए—और आगेआनेकेबाद
किसी दूसरेको पीछेधके लनेकेबजाय उसकेलिए भी जगह बनाए।
यही सामाजिक न्याय है।
यही लोकतंत्र है।
और शायद यही भारत की सबसेबड़ी राजनीतिक सीख भी।





