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खामोशी को हौसलों की आवाज देकर गौरांशी ने रचा इतिहास, डेफलिंपिक्स में जीता स्वर्ण

एशिया पैसिफिक डेफ गेम्स में रजत पदक भी हासिल किया, अब यूनिसेफ इंडिया की यूथ एडवोकेट बनकर बच्चों के अधिकार और समावेशन के लिए कर रहीं काम

भोपाल, 2 सितंबर 2026। सुनने और बोलने की क्षमता नहीं होने के बावजूद गौरांशी शर्मा ने अपनी प्रतिभा, मेहनत और आत्मविश्वास से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन किया है। बैडमिंटन में गौरांशी ने वर्ष 2022 के 24वें समर डेफलिंपिक्स में भारतीय मिक्स्ड टीम के साथ स्वर्ण पदक जीता। इसके बाद वर्ष 2024 में मलेशिया में आयोजित 10वें एशिया पैसिफिक डेफ गेम्स में उन्होंने टीम स्पर्धा में रजत पदक हासिल किया।

खेलों में अपनी पहचान बनाने के बाद गौरांशी अब दिव्यांग बच्चों और युवाओं के अधिकारों के लिए भी काम कर रही हैं। अक्टूबर 2023 में वह यूनिसेफ इंडिया की यूथ एडवोकेट बनीं। वह समावेशन, समावेशी शिक्षा और बच्चों के खेलने के अधिकार जैसे मुद्दों पर अपनी आवाज उठा रही हैं।

आशा निकेतन से शुरू हुआ सफर

गौरांशी का आशा निकेतन उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, बधिरों के लिए से विशेष जुड़ाव रहा है। उनके माता-पिता भी इसी विद्यालय के विद्यार्थी रहे हैं। परिवार को भरोसा था कि विद्यालय में शिक्षा के साथ बच्चों में आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की भावना भी विकसित की जाती है। इसी विश्वास के साथ गौरांशी का दाखिला यहां कराया गया।

बचपन से ही चुनौतियों के बावजूद उनके माता-पिता ने उन्हें कभी कमजोर महसूस नहीं होने दिया। उन्होंने गौरांशी को लगातार आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। विद्यालय के शिक्षकों ने भी उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें अपनी क्षमता दिखाने के अवसर दिए।

बैडमिंटन बना पहचान

पढ़ाई के साथ गौरांशी की रुचि खेलों में बढ़ी और बैडमिंटन ने उनके जीवन को नई दिशा दी। कोर्ट पर उनकी एकाग्रता, अनुशासन और लगातार अभ्यास उनकी सबसे बड़ी ताकत बने।

जहां सामान्य खिलाड़ी खेल के दौरान आवाज और निर्देशों पर भी निर्भर रहते हैं, वहीं गौरांशी ने अपनी दृष्टि, एकाग्रता और अभ्यास के बल पर खेल में अपनी अलग पहचान बनाई। लगातार प्रशिक्षण और मेहनत के बाद उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर खेलने का मौका मिला और फिर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला।

डेफलिंपिक्स में भारत को दिलाया स्वर्ण

वर्ष 2022 में ब्राजील के कासियास दो सुल में आयोजित 24वें समर डेफलिंपिक्स में गौरांशी ने भारतीय मिक्स्ड टीम बैडमिंटन स्पर्धा में हिस्सा लिया। भारतीय टीम ने प्रतियोगिता में पहला स्थान हासिल किया और स्वर्ण पदक जीता।

इस उपलब्धि ने गौरांशी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। उनकी सफलता में परिवार और शिक्षकों के सहयोग के साथ वर्षों की मेहनत और प्रशिक्षण की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

एशिया पैसिफिक डेफ गेम्स में रजत

गौरांशी ने वर्ष 2024 में मलेशिया में आयोजित 10वें एशिया पैसिफिक डेफ गेम्स में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया। बैडमिंटन टीम स्पर्धा में भारतीय टीम ने रजत पदक हासिल किया।

लगातार दो अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीतकर गौरांशी ने अपनी प्रतिभा और निरंतरता साबित की।

यूनिसेफ इंडिया की यूथ एडवोकेट

खेल उपलब्धियों के साथ गौरांशी ने सामाजिक क्षेत्र में भी अपनी भूमिका बनाई है। अक्टूबर 2023 में उन्हें यूनिसेफ इंडिया की यूथ एडवोकेट बनाया गया।

वह समावेशन, समावेशी शिक्षा और बच्चों के खेलने के अधिकार जैसे विषयों को लेकर काम कर रही हैं। उनका प्रयास है कि दिव्यांग बच्चों और अन्य वंचित बच्चों को भी अपनी प्रतिभा विकसित करने के लिए समान अवसर मिलें।

उपलब्धियों से बदली दिव्यांगता को देखने की सोच

गौरांशी की कहानी केवल खेलों में पदक जीतने तक सीमित नहीं है। उनकी उपलब्धियों ने यह संदेश दिया है कि किसी व्यक्ति की पहचान उसकी शारीरिक चुनौतियों से नहीं, बल्कि उसकी क्षमता, मेहनत और उपलब्धियों से होनी चाहिए।

उनकी कहानी उन परिवारों के लिए भी प्रेरणा है, जिनके बच्चे किसी शारीरिक चुनौती के साथ जीवन जी रहे हैं। गौरांशी ने दिखाया है कि सही अवसर, परिवार का सहयोग, शिक्षकों का मार्गदर्शन और निरंतर मेहनत किसी भी बच्चे को अपने सपनों तक पहुंचने का रास्ता दे सकती है।

गौरांशी सुन और बोल नहीं सकतीं, लेकिन बैडमिंटन कोर्ट पर उनकी उपलब्धियां और बच्चों के अधिकारों के लिए उनकी पहल उनकी आवाज बन चुकी हैं।

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