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एआई के दौर में सत्यापन और जवाबदेही ही पत्रकारिता की पहचान: मीडिया सम्मेलन

एमआईटी-डब्ल्यूपीयू के आठवें राष्ट्रीय मीडिया सम्मेलन में फर्जी खबरों, डीपफेक और एल्गोरिदम के प्रभाव पर मंथन

पुणे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के बढ़ते प्रभाव, फर्जी खबरों और मीडिया में जनविश्वास बनाए रखने की चुनौती पर एमआईटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी (एमआईटी-डब्ल्यूपीयू) के आठवें राष्ट्रीय मीडिया एवं पत्रकारिता सम्मेलन में चर्चा हुई। मीडिया एवं संचार विभाग की ओर से ‘संवाद, समावेशिता और शांति’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन में वरिष्ठ पत्रकारों, संपादकों, फिल्म निर्माताओं और नीति विशेषज्ञों ने पत्रकारिता की बदलती भूमिका पर विचार रखे।

उद्घाटन सत्र में कुलपति प्रो. डॉ. रविराजा एन. सीताराम ने कहा कि मीडिया के भविष्य की जिम्मेदारी नई पीढ़ी पर है। पत्रकारिता में केवल खबर प्रकाशित करना सफलता नहीं है, बल्कि तथ्यों की पुष्टि और विश्वसनीय जानकारी पहुंचाना जरूरी है।

स्कूल ऑफ लिबरल आर्ट्स के डीन डॉ. अभिजीत नायर ने कहा कि आज मीडिया के सामने लोगों तक पहुंचने के साथ उनका विश्वास जीतने की चुनौती भी है।

वरिष्ठ पत्रकार एवं डॉक्यूमेंट्री निर्माता रमेश मेनन ने कहा कि अब समाचारों की पहुंच और प्राथमिकता तय करने में एल्गोरिदम की भूमिका बढ़ गई है। उन्होंने चिंता जताई कि एल्गोरिदम का उद्देश्य पाठकों को अधिक समय तक जोड़े रखना है, जबकि पत्रकारिता का लक्ष्य सत्य और जनहित होना चाहिए। ‘द हिंदू’ के हैदराबाद रेजिडेंट एडिटर रवि रेड्डी ने कहा कि एआई और डीपफेक के दौर में खबरों की गति से ज्यादा सत्यापन महत्वपूर्ण है। एआई न्यूजरूम की मदद कर सकता है, लेकिन मानवीय निर्णय का विकल्प नहीं बन सकता।

मीडिया की विश्वसनीयता पर चर्चा

समापन सत्र में न्यूज 24 की कंसल्टिंग एडिटर डॉ. मीना शर्मा ने कहा कि मीडिया के सामने विश्वसनीयता का संकट है। छात्रों को गुणवत्तापूर्ण और जनहित से जुड़ी कहानियां सामने लाने के लिए मुख्यधारा के साथ डिजिटल मंचों का भी उपयोग करना चाहिए।

दो दिवसीय सम्मेलन में पत्रकारिता, फिल्म निर्माण, मीडिया कानून, लोकतंत्र, विज्ञापन और जनसंपर्क में एआई की भूमिका पर चार पैनल चर्चाएं हुईं। सम्मेलन का समापन पत्रकारों और विद्यार्थियों से वायरल खबरों के बजाय सत्यापन, नैतिकता और जनसेवा को प्राथमिकता देने के आह्वान के साथ हुआ।

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