
चंद्रकांति आर्य
देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए बहुराष्ट्रीय, निजी एवं सरकारी संस्थाओं को अधिक से अधिक वर्क फ्रॉम होम अपनाने की सलाह अत्यंत प्रासंगिक और दूरदर्शी कदम है। यह केवल एक अस्थायी व्यवस्था नहीं, बल्कि भविष्य की कार्यसंस्कृति का एक महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।
आज के समय में जब ईंधन की कीमतें, पर्यावरणीय संकट और शहरी जीवन की जटिलताएं लगातार बढ़ रही हैं, ऐसे में वर्क फ्रॉम होम एक प्रभावी विकल्प के रूप में उभरता है। आज की भाग दौड़ भरी जिंदगी में जब हम *कार्य* शब्द सुनते हैं तो दिमाग में सबसे पहले सुबह की हड़बड़ी, ट्रैफिक का शोर और दफ्तर की वह चमचमाती कंक्रीट की इमारतें घूमने लगती है, लेकिन समय बदल चुका है। वर्क फ्रॉम होम को अक्सर कर्मचारियों के आराम या सुविधा से जोड़कर देखा जाता है जबकि इसका असली और गहरा प्रभाव हमारे समाज, हमारी सड़कों, हमारे पर्यावरण के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है । वर्क फ्रॉम होम कार्य करने के फायदे की बात नहीं करता बल्कि विश्लेषण करता है कि कैसे यह व्यवस्था हमारी सड़कों के दबाव को कम करती है जो सुबह 09 बजे दफ्तर के लिए निकलते हैं तो सड़कों की हालत ट्रैफिक जाम की हो जाती है। ऐसे में यदि किसी शहर का 30 प्रतिशत वर्कफोर्स भी घर से काम करता है तो सड़कों पर वाहनों की संख्या में भारी कमी आती है। पीक आवर का ट्रैफिक जो कभी सिर दर्द हुआ करता था वह सामान्य हो जाता है। सड़कों पर गाड़ियां कम होगी तो मानसिक तनाव भी कम होगा। परिणाम स्वरूप सड़क दुर्घटनाओं के ग्राफ में एक भारी गिरावट देखी जा सकेगी।
वर्क फ्रॉम होम के कारण सड़कों की मरम्मत पर होने वाला सरकारी खर्च और जनता का पैसा दोनों बचेंगे।
पारंपरिक ऑफिस संस्कृति ने शहरों में जमीनों की कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया है। कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए हैं। घर से काम करने की संस्कृति एक नया नजरिया देती है। कंपनियों को अब हजारों कर्मचारियों को एक साथ बैठाने के लिए विशाल इमारत की जरूरत नहीं होती। दफ्तर में दिन-रात चलने वाले विशाल एयर कंडीशनर, हजारों लाइट्स और कंप्यूटर जो भारी मात्रा में बिजली की खपत करते हैं, उनमें कमी आती है। यह सीधे तौर पर कार्बन फुटप्रिंट को कम करता है। पर्यावरण और व्यक्ति के जीवन का वर्क फ्रॉम होम का सबसे खूबसूरत पहलू यह है कि यह इंसान को उसकी जड़ों और प्रकृति के करीब लाता है। रोजाना होने वाले सफर के रुकने से लाखों लीटर ईंधन की बचत होती है। जहरीला धुआं हवाओं में नहीं घुलता, जिससे शहरों की हवा सांस लेने योग्य बनती है।एक आम आदमी या नौकरी पेशा व्यक्ति रोज 2 से 3 घंटे सिर्फ सफर में बिता देता है। यह समय उसके पास वापस लौट आता है, जिसे वह अपने परिवार, स्वास्थ्य या किसी रचनात्मक कला को दे सकता है। सड़कों और ऑफिस का दबाव और काम करने के लिए इस व्यवस्था को और बेहतर बनाने तथा शहरों का बोझ कम करने के लिए कुछ नए कदम उठाए जा सकते हैं। कंपनियों को पूरी तरह ऑफिस या पूरी तरह घर के बजाय एक रोटेशन व्यवस्था बनानी चाहिए। उदाहरण के लिए टीम के कुछ सदस्य सोमवार मंगलवार आएंगे और बाकी सदस्य बुधवार और गुरुवार आएं, इससे दफ्तर और सड़कों दोनों पर कभी भी100 प्रतिशत दबाव नहीं पड़ेगा।
मुख्य शहर के केंद्र में एक बड़ा ऑफिस बनाने की बजाय कंपनियां छोटे शहरों या आवासीय इलाकों के पास छोटे वर्क हब बन सकती है, जिससे कर्मचारियों को अपने घर के पास ही ऑफिस का माहौल मिल जाएगा और उसे मुख्य शहर की तरफ भागने की जरूरत नहीं होगी।
सरकारों और कंपनियों को उन कर्मचारियों को विशेष प्रोत्साहन या सराहना देनी चाहिए जो स्वेच्छा से घर से काम करके शहर के इंफ्रास्ट्रक्चर एवं पर्यावरण को बचाने में मदद कर रहे हैं।
यदि ऑफिस आना जरूरी भी हो तो सभी के लिए सुबह 09 से 05 का समय अनिवार्य न हो, लोगों का समय सुबह 07 से 12 के बीच फ्लैक्सिबल रखने से सड़कों पर एक ही समय में होने वाली भीड़ को पूरी तरह टाला जा सकता है।
वर्क फ्रॉम होम को अब एक अस्थाई विकल्प के रूप में नहीं बल्कि एक सतत जीवन शैली के रूप में देखा जाना चाहिए। यह कंपनियों के खर्चों में बचत है, कर्मचारियों के लिए मानसिक शांति है, सड़कों के लिए राहत है और हमारी धरती के लिए एक नया जीवन। जब हम घर से काम करते हैं तो हम केवल अपनी आजीविका नहीं कमा रहे होते बल्कि हम एक शांत, स्वच्छ और अधिक संतुलित दुनिया के निर्माण में भी योगदान दे रहे होते हैं।
प्रतिदिन दफ्तर आने जाने की बाध्यता समाप्त होने से लाखों लीटर पेट्रोल डीजल के जलने से बच जाता है, जहरीली गैसे और कार्बन के कण हवा में घुलने बंद हो जाते हैं जिससे शहरों का आसमान पुनः नीला और हवा सांस लेने योग्य हो जाती है। वर्क फ्रॉम होम कर्मचारियों को मानसिक शांति और अवसाद से मुक्ति देती है।अंततः हमारी इस धरा को एक नया जीवन प्रदान करती है। वर्क फ्रॉम होम केवल एक सुविधा नहीं बल्कि एक जिम्मेदार और पर्यावरण अनुकूल कार्यशैली है जिसे समय की मांग के अनुरूप अधिक से अधिक प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इससे देश की आत्मनिर्भरता में भी योगदान मिलेगा।
*(लेखिका साहित्यकार और समसामयिक मुद्दों पर लिखती हैं)*
