Opinion

तीन दरोगाओं का निलंबन: पुलिस व्यवस्था पर गंभीर सवाल

प्रयागराज में रकम की कथित हेराफेरी से लेकर फर्जी मुठभेड़ों तक, अदालतों की टिप्पणियां पुलिस की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर उठाती हैं सवाल

प्रयागराज में तीन दरोगाओं का निलंबन पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यह मामला केवल कथित रिश्वतखोरी या रकम की हेराफेरी तक सीमित नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था की ओर भी ध्यान दिलाता है, जिसमें कानून लागू करने वालों पर ही कानून के उल्लंघन के आरोप लग रहे हैं।

मध्य प्रदेश के रीवा निवासी विपिन पाठक अपने दोस्त के साथ शादी की खरीदारी के लिए प्रयागराज आए थे। उनकी कार में खरीदारी के लिए 6.55 लाख रुपये रखे थे। आरोप है कि नैनी क्षेत्र में पुलिस ने जांच के दौरान रकम देखने के बाद दोनों युवकों को स्मैक तस्करी के मामले में फंसा दिया। मुकदमे में 6.55 लाख रुपये के बजाय केवल 87,500 रुपये की बरामदगी दिखाई गई और बाकी रकम कथित तौर पर हड़प ली गई।

पुलिस ने दोनों युवकों के पास से तमंचे और पिस्टल बरामद होने का दावा भी किया। हालांकि, अदालत की जांच में हथियार चलने योग्य नहीं पाए गए। इसके बाद रिमांड की अर्जी खारिज कर दी गई और पुलिस की भूमिका पर सवाल उठे। अदालत के आदेश पर विभागीय जांच के दौरान रकम लौटाने को लेकर बातचीत का कथित ऑडियो वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचा। इसके बाद दरोगा विक्की गुप्ता, रामानंद विश्वकर्मा और नीलेश कुमार को निलंबित कर दिया गया।

अदालतों की टिप्पणियां भी गंभीर

उत्तर प्रदेश में पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने का यह पहला मामला नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में कथित फर्जी मुठभेड़ों और अर्ध-मुठभेड़ों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट कई बार कड़ी टिप्पणियां कर चुका है। अदालत ने घुटनों पर गोली मारकर उसे मुठभेड़ बताने की कार्रवाई को पूरी तरह अस्वीकार्य बताया। साथ ही ऐसी कार्रवाई के पीछे अधिकारियों को खुश करने, समय से पहले पदोन्नति पाने और सोशल मीडिया पर वाहवाही हासिल करने की आशंका भी जताई।

गैरकानूनी हिरासत के एक मामले में चार दिन तक बंधक रखे गए व्यक्ति के भाई को अदालत ने 40 हजार रुपये मुआवजा दिलाया। वहीं, एक परिवार पर बिना पर्याप्त सबूत गैंगस्टर एक्ट लगाने के मामले में अदालत ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के कथित दुरुपयोग के मामले में जिलाधिकारी पर पांच लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।

आदेश देने वाले बचते हैं, पुलिसकर्मी फंसते हैं

उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी सुलखान सिंह ने फर्जी मुठभेड़ों के पीछे वरिष्ठ अधिकारियों और सरकारों के कथित दबाव का मुद्दा उठाया है। उनका कहना है कि कई बार अधीनस्थ पुलिसकर्मियों पर अवैध दबाव डालकर ऐसी कार्रवाई कराई जाती है, लेकिन मामला सामने आने पर आदेश देने वाले अधिकारी उनका साथ नहीं देते।

उन्होंने गाजीपुर में 22 साल और सीतापुर में 25 साल बाद पुलिसकर्मियों को सजा मिलने के मामलों का उल्लेख करते हुए बताया कि ऐसे मामलों में करीब 250 पुलिसकर्मी जेल में हैं और उन्हें हाईकोर्ट से भी जमानत नहीं मिली है।

प्रयागराज के ताजा मामले में भी सुलखान सिंह ने 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने की बात कही है। हालांकि, इन मामलों में आरोपों और न्यायिक निष्कर्षों के बीच अंतर करना जरूरी है।

जवाबदेही तय करने की जरूरत

पुलिस का काम अपराध रोकना और कानून लागू करना है। लेकिन जब कार्रवाई की सफलता का पैमाना मुठभेड़ों की संख्या, गिरफ्तारी के आंकड़े या राजनीतिक नेतृत्व की संतुष्टि बन जाता है, तब कानूनी प्रक्रिया और नागरिक अधिकार पीछे छूटने का खतरा बढ़ जाता है।

अदालतों की निगरानी और विभागीय जांच से गलत कार्रवाई सामने आना जरूरी है, लेकिन केवल निलंबन या मुआवजे से व्यवस्था में सुधार नहीं होगा। इसके लिए पुलिसकर्मियों के मूल्यांकन की प्रणाली बदलनी होगी। किसी अधिकारी की पदोन्नति और सफलता का आधार मुठभेड़ों की संख्या नहीं, बल्कि कानून के अनुसार कार्रवाई, निष्पक्ष जांच और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा होना चाहिए।

प्रयागराज के तीन दरोगाओं का निलंबन एक कार्रवाई जरूर है, लेकिन असली सवाल उस व्यवस्था से है, जिसमें कानून के रखवाले ही कथित तौर पर कानून तोड़ने का साहस कर लेते हैं। जब तक जवाबदेही ऊपर से नीचे तक तय नहीं होगी, तब तक ऐसी घटनाओं पर कार्रवाई तो होती रहेगी, लेकिन व्यवस्था पर उठने वाले सवाल खत्म नहीं होंगे।

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