विशेष आलेख : ब्रिक्स ने दी महिला उद्यमियों को एक नई दिशा

महिला स्वयं सहायता समूहों को नई उद्यमिता शक्ति बनाने का समय
*डॉ. आर. एच. लता*
भारत के ग्रामीण आर्थिक परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव आकार ले चुका है। स्वयं सहायता समूहों ने करोड़ों ग्रामीण महिलाओं को बचत, ऋण, आजीविका और आर्थिक गतिविधियों से जोड़ा है। अब अगला सवाल यह है कि इस विशाल महिला नेटवर्क को टिकाऊ उद्यम, रोजगार और बाजार की शक्ति में कैसे बदला जाए। आज आवश्यकता केवल महिलाओं को वित्त उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि उन्हें उत्पादक, उद्यमी, नियोक्ता और बाजार की सक्रिय भागीदार बनाने की है। स्व सहायता समूह आंदोलन अब उस चरण में पहुँच चुका है जहाँ वित्तीय समावेशन के बाद उद्यम विकास को उसकी अगली प्राथमिकता बनाना समय की मांग है। फरवरी 2026 में जारी सरकारी जानकारी के अनुसार, दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत 10.05 करोड़ से अधिक ग्रामीण महिलाओं को 90.90 लाख से अधिक स्व सहायता समूहों में संगठित किया जा चुका है। यह दुनिया के सबसे बड़े सामुदायिक महिला नेटवर्कों में से एक है।
यह केवल सामाजिक संगठन का नेटवर्क नहीं है। यह भारत की ग्रामीण महिला आर्थिक शक्ति का विशाल आधार है। यदि इस नेटवर्क को कौशल, तकनीक, पूंजी, उत्पादन, ब्रांडिंग और बाजार से व्यवस्थित रूप से जोड़ा जाए, तो इसका प्रभाव परिवार की आय से आगे बढ़कर गांव, जिले और ग्रामीण अर्थव्यवस्था तक पहुँच सकता है। इसीलिए अब सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने स्व सहायता समूह बने, बल्कि यह होना चाहिए कि कितने समूह सफल और टिकाऊ उद्यमों में परिवर्तित हुए।
*वित्त से आगे—अब बाजार और व्यवसाय की ओर :*
स्व सहायता समूहों को औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से जोड़ने में देश ने उल्लेखनीय प्रगति की है। लेकिन किसी महिला को ऋण मिल जाना उद्यमिता की अंतिम मंजिल नहीं है। वास्तविक सफलता तब होगी जब पूंजी किसी ऐसे व्यवसाय में बदले जो लगातार आय पैदा करे, बाजार में प्रतिस्पर्धा करे और समय के साथ रोजगार भी उत्पन्न करे। इसलिए नीति का अगला चरण क्रेडिट से कैश-फ्लो, ऋण से निवेश और आजीविका से व्यवसाय की दिशा में होना चाहिए। ग्रामीण महिलाओं के लिए यह परिवर्तन केवल आर्थिक नहीं होगा। सफल महिला उद्यम परिवार के निर्णयों में उनकी भूमिका मजबूत करेगा, स्थानीय रोजगार बढ़ाएगा और गांवों में नई आर्थिक गतिविधियों को जन्म देगा।
*लखपति दीदी से उद्यमी और रोजगारदाता महिला :*
महिला स्व सहायता समूह आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक यह है कि अब बड़ी संख्या में महिलाएँ अपनी आय बढ़ाकर लखपति दीदी की पहचान बना रही हैं। 2026 में सरकारी जानकारी के अनुसार 3 करोड़ से अधिक लखपति दीदियों का लक्ष्य पार किया जा चुका है और अब 6 करोड़ लखपति दीदियों का लक्ष्य रखा गया है।
यह उपलब्धि महत्वपूर्ण है, लेकिन अगला लक्ष्य केवल व्यक्तिगत आय तक सीमित नहीं होना चाहिए। अब ऐसी महिलाओं की संख्या बढ़ानी होगी जो अपना व्यवसाय स्थापित करें, स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करें, दूसरे समूहों को बाजार से जोड़ें, अपने उत्पादों को ब्रांड के रूप में विकसित करें और राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा करें। अर्थात लखपति दीदी से उद्यमी दीदी और उद्यमी दीदी से रोजगारदाता दीदी तक की यात्रा अगला लक्ष्य होनी चाहिए।
*स्थानीय उत्पादों को वैश्विक बाजार मिले :*
भारत के विभिन्न राज्यों में स्व सहायता समूहों की महिलाएँ हस्तशिल्प, हथकरघा, खाद्य प्रसंस्करण, कृषि आधारित उत्पाद, वस्त्र, प्राकृतिक उत्पाद और पारंपरिक कलाओं से जुड़े अनेक उत्पाद तैयार करती हैं। भारत की वास्तविक ताकत इन स्थानीय उत्पादों में है। चुनौती अक्सर उत्पादन क्षमता की नहीं, बल्कि गुणवत्ता, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, प्रमाणन, डिजिटल पहचान और बाजार पहुँच की होती है। इस दिशा में सकारात्मक पहल पहले से दिखाई दे रही है। सरकार का ई-सारस मंच स्व सहायता समूहों और उनके महासंघों द्वारा बनाए गए उत्पादों के लिए डिजिटल बाजार उपलब्ध करा रहा है। 2026 में सरकार ने यह भी बताया कि महिला समूहों को डिजिटल ऑनबोर्डिंग, उत्पाद सूचीकरण, ब्रांडिंग, पैकेजिंग, उत्पाद फोटोग्राफी, डिजिटल मार्केटिंग, इन्वेंटरी और ऑर्डर प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यह दिशा सही है। अब इसे और बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
*स्व सहायता समूह से सतत उद्यम मिशन :*
वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए वर्ष 2026–2030 के लिए स्व सहायता समूह से सतत उद्यम मिशन जैसी विशेष राष्ट्रीय पहल पर विचार किया जाना चाहिए। इस मिशन का उद्देश्य नए समूह बनाना मात्र नहीं, बल्कि मौजूदा सक्षम समूहों को औपचारिक, टिकाऊ, बाजार-उन्मुख और रोजगार-सृजन करने वाले उद्यमों में बदलना होना चाहिए। इसके लिए दस प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान दिया जा सकता है।
पहला, परिपक्व स्वयं सहायता समूहों को औपचारिक सूक्ष्म उद्यमों में बदलने के लिए सरल और एकीकृत व्यवस्था बनाई जाए। पंजीकरण, बैंकिंग, लेखांकन, डिजिटल भुगतान और नियामकीय प्रक्रियाओं में सहायता मिले। दूसरा, प्रत्येक समूह की स्थानीय क्षमता, कौशल और संसाधनों के आधार पर व्यावसायिक उत्पादों की पहचान की जाए। डिजाइन, गुणवत्ता, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और प्रमाणन की संस्थागत सुविधा उपलब्ध हो। तीसरा, केवल प्रारंभिक ऋण ही नहीं, बल्कि कार्यशील पूंजी, उपकरण वित्त, ऋण गारंटी और व्यवसाय विस्तार के लिए आवश्यक विकास पूंजी उपलब्ध कराई जाए। चौथा, महिला उद्यमों को डिजिटल लेखांकन, ई-कॉमर्स, डिजिटल भुगतान, आधुनिक उत्पादन तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित व्यावसायिक उपकरणों से जोड़ा जाए।
पाँचवाँ, सरकारी खरीद, निजी क्षेत्र, संस्थागत खरीदारों, पर्यटन, व्यापार मेलों और डिजिटल वाणिज्य मंचों के साथ स्थायी बाजार संपर्क विकसित किया जाए।
छठा, समान उत्पाद बनाने वाले समूहों को क्लस्टर आधारित उद्यम मॉडल में संगठित किया जाए। साझा मशीनरी, प्रसंस्करण, भंडारण, पैकेजिंग, गुणवत्ता परीक्षण और परिवहन सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ। सातवाँ, प्रत्येक जिले में महिला स्वयं सहायता समूह उद्यमिता केंद्र स्थापित किए जाएँ, जहाँ व्यवसाय योजना, लागत निर्धारण, विपणन, वित्तीय प्रबंधन, डिजिटल तकनीक और निर्यात संबंधी मार्गदर्शन उपलब्ध हो।
आठवाँ, पात्र महिला उद्यमों को सार्वजनिक खरीद व्यवस्था से जोड़ने के लिए विशेष अवसर विकसित किए जाएँ। इससे छोटे उद्यमों को नियमित और संस्थागत बाजार मिलेगा। नौवाँ, एक राष्ट्रीय स्व सहायता समूह उद्यमिता डैशबोर्ड विकसित किया जाए, जिसमें समूहों की संख्या के साथ-साथ कारोबार, रोजगार, महिलाओं की आय, औपचारिक पंजीकरण, संस्थागत ऋण, बाजार पहुँच और निर्यात जैसे वास्तविक आर्थिक संकेतक शामिल हों। दसवाँ, सफल समूहों को ऐसे उद्यमों में विकसित किया जाए जो अपनी सदस्य महिलाओं के साथ-साथ अन्य ग्रामीण युवाओं और परिवारों के लिए भी रोजगार पैदा करें।
*ब्रिक्स और वैश्विक दक्षिण में अवसर :*
भारत की ब्रिक्स में सक्रिय भूमिका महिला स्व सहायता समूहों के उत्पादों के लिए नए अवसर पैदा कर सकती है। ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार, निवेश और तकनीकी सहयोग की संभावनाओं का उपयोग महिला-नेतृत्व वाले स्थानीय उद्यमों को नए बाजारों से जोड़ने के लिए किया जा सकता है। हस्तशिल्प, प्राकृतिक उत्पाद, खाद्य प्रसंस्करण, वस्त्र और पारंपरिक कलाओं जैसे क्षेत्रों में भारत की विशिष्टता को लोकल टू ग्लोबल रणनीति के साथ जोड़ा जा सकता है। इसके लिए केवल निर्यात की सुविधा पर्याप्त नहीं होगी। उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता, पैकेजिंग, प्रमाणन, ब्रांडिंग और लॉजिस्टिक्स की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार करना होगा।
*सफलता का पैमाना बदलना होगा :*
अब स्व सहायता समूहों की सफलता का मूल्यांकन केवल बचत, ऋण और समूहों की संख्या से नहीं किया जाना चाहिए। हमें पूछना होगा कि कितने समूह वास्तविक व्यवसाय बने, कितने उद्यमों का कारोबार बढ़ा, कितने रोजगार पैदा हुए, महिलाओं की आय कितनी बढ़ी, कितने उत्पाद राष्ट्रीय बाजार तक पहुँचे और कितने उद्यम अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुँचे । यही वे संकेतक हैं जो आने वाले वर्षों में महिला उद्यमिता की वास्तविक सफलता को परिभाषित करेंगे।
*महिला को लाभार्थी नहीं, उद्यमी बनाना होगा :*
भारत ने स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को संगठित करने और उन्हें आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने की ऐतिहासिक नींव तैयार की है। अब उस नींव पर एक नई आर्थिक संरचना खड़ी करने का समय है। महिला को केवल लाभार्थी मानने की सोच से आगे बढ़कर उसे निर्माता, उद्यमी और नियोक्ता के रूप में देखना होगा।
2026 का भारत उस दिशा में आगे बढ़ सकता है जहाँ स्वयं सहायता समूह केवल आजीविका का माध्यम न रहकर स्थायी उद्यमों की नर्सरी बनें। जहाँ समूह की महिला सदस्य अपने उत्पाद का मूल्य तय करे, अपना ब्रांड बनाए, डिजिटल बाजार तक पहुँचे और आवश्यकता पड़ने पर दूसरों को रोजगार भी दे। आज ईसारस, सारस आजीविका, डिजिटल वाणिज्य और बाजार संपर्क जैसी पहलें यह संकेत दे रही हैं कि यह परिवर्तन संभव है। 2026 में सरकार द्वारा स्वयं सहायता समूहों के उत्पादों को भारत टेक्स जैसे बड़े मंचों पर प्रदर्शित करना भी इस बढ़ती बाजार क्षमता का उदाहरण है। अब आवश्यकता इन पहलों को एक व्यापक उद्यमिता नीति से जोड़ने की है।
भारत के पास महिला शक्ति है। भारत के पास उत्पाद हैं। भारत के पास स्वयं सहायता समूहों का विशाल नेटवर्क है। भारत के पास डिजिटल बाजार की बढ़ती क्षमता भी है। अब इन सभी शक्तियों को एकीकृत उद्यम मॉडल में बदलना है। दिशा स्पष्ट होनी चाहिए स्वयं सहायता समूह से सतत उद्यम तक, महिला से उद्यमी तक, आजीविका से रोजगार तक, स्थानीय उत्पाद से राष्ट्रीय और वैश्विक बाजार तक, यही स्वयं सहायता समूह आंदोलन का अगला चरण होना चाहिए। यदि भारत इस परिवर्तन को सही नीति, पर्याप्त पूंजी, आधुनिक तकनीक, कौशल और बाजार समर्थन देता है, तो स्वयं सहायता समूह केवल ग्रामीण महिला सशक्तीकरण की कहानी नहीं रहेंगे। वे भारत की नई महिला उद्यमिता शक्ति, ग्रामीण रोजगार और समावेशी आर्थिक विकास के मजबूत स्तंभ बन सकते हैं।
*(लेखिका—डा आर एच लता, राष्ट्रीय अध्यक्ष, विक्की एस एच जी डेवलपमेंट काउंसिल )*





