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ोपाल। मध्य प्रदेश ने 785 बाघों के साथ देश के ‘टाइगर स्टेट’ के रूप में अपनी पहचान और मजबूत की है। राज्य अब केवल बाघों की बढ़ती संख्या के लिए ही नहीं, बल्कि सामुदायिक भागीदारी आधारित संरक्षण मॉडल के लिए भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में है। यहां वन संरक्षण को स्थानीय आजीविका, महिला सशक्तिकरण, इको-टूरिज्म, ग्रामीण उद्यमिता और पर्यावरण प्रबंधन से जोड़कर ऐसा मॉडल विकसित किया गया है, जिससे जंगलों और स्थानीय समुदायों दोनों को लाभ मिल रहा है।
मध्यप्रदेश पर्यटन बोर्ड के प्रबंध संचालक एवं पर्यटन सचिव डॉ. इलैयाराजा टी. ने कहा कि स्थानीय समुदायों को वन संरक्षण का प्रमुख भागीदार बनाना सरकार की प्राथमिकता है। उनके अनुसार, जब स्थानीय परिवार होम-स्टे, सफारी संचालन और इको-टूरिज्म के माध्यम से अपनी आजीविका अर्जित करते हैं, तो जंगलों का संरक्षण उनकी स्वाभाविक जिम्मेदारी बन जाता है।
ग्रामीणों की बढ़ी आय, संरक्षण में बढ़ी भागीदारी
कान्हा, बांधवगढ़, पेंच, पन्ना और सतपुड़ा जैसे प्रमुख टाइगर रिजर्व के आसपास रहने वाले ग्रामीण और आदिवासी समुदाय अब संरक्षण अभियान का अहम हिस्सा हैं। सफारी सेवाओं, स्थानीय गाइड, होम-स्टे, ग्रामीण पर्यटन और हस्तशिल्प के माध्यम से हजारों परिवारों को रोजगार मिल रहा है। पर्यटक स्थानीय कारीगरों द्वारा तैयार गोंड पेंटिंग, बांस शिल्प और टेराकोटा कला की खरीदारी कर रहे हैं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली है।
पन्ना की वापसी बनी सफलता की मिसाल
वर्ष 2009 में बाघविहीन हो चुके पन्ना टाइगर रिजर्व ने सामुदायिक भागीदारी, वैज्ञानिक प्रबंधन और प्रभावी संरक्षण के दम पर उल्लेखनीय वापसी की है। वर्तमान में यहां 80 से अधिक बाघ मौजूद हैं, जिसे देश के सबसे सफल वन्यजीव संरक्षण प्रयासों में गिना जाता है।
इको-टूरिज्म से बढ़े रोजगार
मध्यप्रदेश पर्यटन बोर्ड के अनुसार, राज्य के प्रमुख राष्ट्रीय उद्यानों के आसपास 95 पंजीकृत होम-स्टे संचालित हो रहे हैं। इनमें कान्हा में 31, बांधवगढ़ में 24, पन्ना में 16, पेंच में 13 और मढ़ई-सतपुड़ा क्षेत्र में 11 होम-स्टे शामिल हैं। इनसे पर्यटन का आर्थिक लाभ सीधे स्थानीय परिवारों तक पहुंच रहा है।
‘प्रोजेक्ट क्लीन डेस्टिनेशन’ बना उदाहरण
वर्ष 2022 में पन्ना में शुरू किए गए ‘प्रोजेक्ट क्लीन डेस्टिनेशन’ के तहत 14 ग्राम पंचायतों के 30 गांवों में ठोस कचरा प्रबंधन प्रणाली लागू की गई। अब तक 45 टन से अधिक कचरे का वैज्ञानिक तरीके से प्रसंस्करण किया जा चुका है। गैर-पुनर्चक्रणीय प्लास्टिक के 42 प्रतिशत हिस्से को अपसाइकिल कर बैग, स्टेशनरी और अन्य उपयोगी उत्पाद बनाए जा रहे हैं। इस मॉडल को अब बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में भी लागू किया गया है।
महिलाएं बनीं संरक्षण अभियान की ताकत
वन क्षेत्रों में महिलाओं को सफारी गाइड, जिप्सी चालक और पर्यटन गतिविधियों से जोड़कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है। वहीं वन समितियां और स्थानीय ग्रामीण अवैध शिकार रोकने, वन्यजीव गलियारों की सुरक्षा और मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
तकनीक से मजबूत हो रहा संरक्षण
राज्य में बाघों की निगरानी के लिए वन विभाग M-STrIPES जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर रहा है। साथ ही ‘बफर में सफर’ जैसी पहल के माध्यम से बफर क्षेत्रों में वर्षभर पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर सृजित हो रहे हैं। वीरांगना दुर्गावती और रातापानी टाइगर रिजर्व के विकास से प्रदेश का संरक्षण नेटवर्क भी लगातार मजबूत हो रहा है।
मध्य प्रदेश का यह मॉडल दर्शाता है कि वन्यजीव संरक्षण, सतत पर्यटन, स्वच्छ पर्यावरण और स्थानीय आजीविका के बीच संतुलन बनाकर संरक्षण को जनभागीदारी का सफल अभियान बनाया जा सकता है।
