एम्स भोपाल में MP-TROPACON का तीसरा सम्मेलन, परजीवी रोगों की रोकथाम पर मंथन

वन हेल्थ पर जोर, मानव-पशु और पर्यावरण के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत बताई

भोपाल। परजीवी रोगों की समय पर पहचान और रोकथाम को मजबूत करने के उद्देश्य से एम्स भोपाल में भारतीय उष्णकटिबंधीय परजीवी विज्ञान अकादमी के मध्य प्रदेश अध्याय का तीसरा वार्षिक राज्य सम्मेलन MP-TROPACON आयोजित किया गया। सम्मेलन का विषय “वन हेल्थ इंटरफेस पर परजीवी विज्ञान : दृष्टिकोण और रणनीतियाँ” रहा।

कार्यक्रम एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक प्रोफेसर (डॉ.) माधवानन्द कर के नेतृत्व में आयोजित हुआ। सम्मेलन की अध्यक्षता प्रोफेसर (डॉ.) देबासिस बिस्वास ने की, जबकि आयोजन सचिव डॉ. आयुष गुप्ता रहे।

13 मेडिकल कॉलेजों के विशेषज्ञों ने लिया हिस्सा

सम्मेलन से पहले एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई। इसमें मध्य प्रदेश के 13 मेडिकल कॉलेजों के 26 माइक्रोबायोलॉजी विशेषज्ञों ने भाग लिया। विशेषज्ञों को मलेरिया, फाइलेरियासिस, जिआर्डियासिस और अन्य परजीवी संक्रमणों की पारंपरिक और आधुनिक जांच तकनीकों की जानकारी दी गई।

सम्मेलन में प्रसिद्ध परजीवी रोग विशेषज्ञ डॉ. एस. सी. परिजा तथा एम्स नई दिल्ली के माइक्रोबायोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. बी. आर. मिर्धा सहित विभिन्न सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों के विशेषज्ञ शामिल हुए।

मानव, पशु और पर्यावरण के स्वास्थ्य पर जोर

सम्मेलन में वन हेल्थ यानी एकीकृत स्वास्थ्य दृष्टिकोण को प्रमुखता दी गई। विशेषज्ञों ने कहा कि मानव स्वास्थ्य पर पशुओं के स्वास्थ्य और पर्यावरण का भी सीधा प्रभाव पड़ता है। इसलिए परजीवी और अन्य संक्रामक रोगों की रोकथाम के लिए स्वास्थ्य, पशुपालन और पर्यावरण से जुड़े विभागों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है।

विशेषज्ञों ने बीमारी की जल्द पहचान, लगातार निगरानी और मच्छरों सहित रोग फैलाने वाले वाहकों के नियंत्रण को प्रभावी रोकथाम के लिए महत्वपूर्ण बताया।

शहरीकरण और बदलते पर्यावरण पर भी चर्चा

सम्मेलन में एम्स भोपाल, ICMR-NIREH, ICAR-NIHSAD और राज्य पशुपालन विभाग के विशेषज्ञों ने विचार साझा किए। तेजी से बढ़ते शहरीकरण, बदलते पर्यावरण और जीवनशैली के कारण परजीवी रोगों के स्वरूप में हो रहे बदलाव पर भी चर्चा हुई।

विशेषज्ञों ने पिछले दस वर्षों में परजीवी और वेक्टर जनित रोगों के नियंत्रण में हुई प्रगति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इन उपलब्धियों को बनाए रखने के लिए नियमित जांच, मजबूत निगरानी और रोग फैलाने वाले वाहकों के नियंत्रण का काम लगातार जारी रखना जरूरी है।

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