TET परीक्षा को लेकर शिक्षक संगठनों की आपत्ति, पाठ्यक्रम और परीक्षा पैटर्न में विसंगतियों का आरोप

भोपाल। मध्यप्रदेश में शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। शिक्षकों से जुड़े प्रतिनिधियों ने TET परीक्षा के पाठ्यक्रम, परीक्षा पद्धति, फीस और पासिंग मानकों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि परीक्षा में विषयवार असमानता और ऐसी विसंगतियां हैं, जिनका सीधा असर वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों पर पड़ सकता है।
शिक्षकों का कहना है कि अलग-अलग विषयों के पाठ्यक्रम में काफी अंतर है। सामाजिक विज्ञान का सिलेबस अत्यधिक विस्तृत है, जबकि अन्य विषयों का पाठ्यक्रम तुलनात्मक रूप से सीमित है। गणित विषय में त्रिकोणमिति के साथ विज्ञान के पांच यूनिट शामिल किए जाने पर भी सवाल उठाए गए हैं। उनका तर्क है कि गणित शिक्षक से गणित के साथ विज्ञान की परीक्षा लेना समानता के सिद्धांत के विपरीत है।
शिक्षकों ने सवाल उठाया कि RTE के तहत कक्षा 6 से 8 तक गणित, सामाजिक विज्ञान और अंग्रेजी के अलग-अलग पद हैं। ऐसे में यदि गणित के साथ विज्ञान को जोड़ा गया है तो अंग्रेजी के साथ हिंदी और संस्कृत को क्यों नहीं जोड़ा गया? इसे शिक्षकों ने भेदभावपूर्ण व्यवस्था बताया है।
30-32 साल से सेवा दे रहे शिक्षकों की परीक्षा पर सवाल
शिक्षक संगठनों ने लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों से कंप्यूटर आधारित परीक्षा कराने पर भी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि 30 से 32 वर्ष से शिक्षण कार्य कर रहे शिक्षकों की दक्षता का आकलन करने के लिए परीक्षा की मौजूदा पद्धति उचित नहीं है।
इसके अलावा सेवारत शिक्षकों से TET की फीस लिए जाने पर भी सवाल उठाया गया है। शिक्षकों का दावा है कि यह परीक्षा पदोन्नति के लिए नहीं, बल्कि सेवा में बने रहने से जुड़ी है, इसलिए फीस वसूली के औचित्य पर पुनर्विचार होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश की उचित व्याख्या की मांग
शिक्षकों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन किया जाना चाहिए, लेकिन उसकी ऐसी व्याख्या नहीं होनी चाहिए जिससे वर्तमान भर्ती और सेवा नियम प्रभावित हों। उनका दावा है कि वर्ष 1982 के भर्ती नियम अभी भी प्रभावी हैं। ऐसे में TET की मौजूदा व्यवस्था लागू होने से पुराने भर्ती नियमों पर असर पड़ सकता है।
शिक्षकों ने मांग की है कि पाठ्यक्रम, परीक्षा पद्धति और पासिंग मानकों की समीक्षा की जाए तथा सेवा नियमों के अनुरूप स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाए। साथ ही यदि पुराने भर्ती नियम प्रभावी हैं तो उच्च श्रेणी शिक्षकों को वरिष्ठता के आधार पर व्याख्याता और प्राचार्य पदों पर भूतलक्षी पदोन्नति देने पर भी विचार किया जाए।





