भोपाल में राजस्व वसूली अभियान तेज: मई में 1.34 करोड़ रुपये की वसूली, लंबित मामलों पर प्रशासन की सख्ती

रेरा सहित विभिन्न प्रकरणों में कार्रवाई, लंबित राजस्व वसूली मामलों के निराकरण पर फोकस

भोपाल जिला प्रशासन ने लंबित राजस्व वसूली प्रमाण-पत्र (आरआरसी) प्रकरणों के निपटारे के लिए विशेष अभियान चलाकर मई माह में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। कलेक्टर प्रियंक मिश्रा के निर्देशन में संचालित इस अभियान के तहत तहसील स्तर पर की गई कार्रवाई में विभिन्न मामलों से कुल 1 करोड़ 34 लाख रुपये की वसूली दर्ज की गई।

प्रशासन के अनुसार यह वसूली रेरा (रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी) से संबंधित मामलों सहित अन्य राजस्व देयताओं वाले प्रकरणों में की गई है। लंबे समय से लंबित पड़े मामलों को प्राथमिकता देकर राजस्व संग्रह बढ़ाने और बकाया राशि की वसूली सुनिश्चित करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

क्यों महत्वपूर्ण है आरआरसी वसूली अभियान?

राजस्व वसूली प्रमाण-पत्र (Recovery Certificate) ऐसे मामलों में जारी किए जाते हैं, जहां संबंधित व्यक्ति, संस्था या कंपनी पर सरकारी अथवा वैधानिक देनदारी बकाया होती है। निर्धारित समय सीमा में भुगतान नहीं होने पर प्रशासन राजस्व वसूली की प्रक्रिया शुरू करता है।

विशेषज्ञों के अनुसार लंबित आरआरसी मामलों का समयबद्ध निराकरण न केवल सरकारी राजस्व को मजबूत करता है, बल्कि विभिन्न नियामक संस्थाओं और प्रशासनिक आदेशों के प्रभावी क्रियान्वयन को भी सुनिश्चित करता है। खासकर रियल एस्टेट क्षेत्र में ऐसी कार्रवाई उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा और नियामक व्यवस्था की विश्वसनीयता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

रेरा मामलों में बढ़ी जवाबदेही

हाल के वर्षों में रेरा के माध्यम से घर खरीदारों और निवेशकों को राहत दिलाने के लिए कई आदेश जारी किए गए हैं। ऐसे मामलों में यदि बिल्डर या संबंधित पक्ष आदेशों का पालन नहीं करते हैं, तो वसूली की प्रक्रिया प्रशासनिक माध्यमों से आगे बढ़ाई जाती है।

भोपाल में हुई यह वसूली इस बात का संकेत है कि प्रशासन अब केवल आदेश जारी करने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन पर भी जोर दे रहा है।

नियमित समीक्षा से बढ़ेगी वसूली की रफ्तार

जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि लंबित आरआरसी प्रकरणों की लगातार समीक्षा की जा रही है और संबंधित अधिकारियों को समयबद्ध कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। राजस्व विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित मॉनिटरिंग और डिजिटल ट्रैकिंग व्यवस्था से ऐसे मामलों के निराकरण की गति और बढ़ सकती है।

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