भोज वेटलैंड मामले में एनजीटी सख्त, सरकारी जमीन पर अतिक्रमण हुआ तो अफसरों की भी तय होगी जवाबदेही

कब्जा करने वाला ही नहीं, होने देने वाला भी कटघरे में

भोपाल। भोज वेटलैंड और शहर के जल निकायों में अतिक्रमण व अवैध निर्माण के मामले में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने सरकारी जमीन की सुरक्षा को लेकर सख्त टिप्पणी की है। अधिकरण ने कहा कि सरकारी जमीन पर कब्जे के मामले में केवल अतिक्रमणकारी पर कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखा जाना चाहिए कि कब्जा होने तक संबंधित अधिकारी और प्रशासनिक तंत्र ने क्या किया। अधिकारियों की निष्क्रियता या लापरवाही से यदि अतिक्रमण या अवैध निर्माण हुआ है तो उनकी जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए। अधिकरण ने स्पष्ट किया कि सरकारी जमीन किसी व्यक्ति या अधिकारी की पैतृक संपत्ति नहीं है। यह टिप्पणी ओए क्रमांक 77/2020 और ओए क्रमांक 12/2025, राशिद नूर खान बनाम कलेक्टर, भोपाल एवं अन्य की सुनवाई के दौरान की गई।

पहले सीमा तय होगी, फिर सामने आएगा अतिक्रमण

एनजीटी ने भोज वेटलैंड और जल निकायों की वास्तविक सीमा स्पष्ट करने पर जोर दिया है। इसके लिए फुल टैंक लेवल (एफटीएल)/फुल रिजर्वायर लेवल (एफआरएल) के आधार पर सीमांकन किए जाने की जरूरत बताई गई है। सीमा स्पष्ट होने के बाद ही यह तय किया जा सकेगा कि कौन सा निर्माण जल निकाय की सीमा या प्रतिबंधित क्षेत्र में है। एनजीटी के रिकॉर्ड में एफटीएल के आसपास 50 मीटर के नो-कंस्ट्रक्शन जोन में अनधिकृत आवासीय निर्माण, मैरिज गार्डन, व्यावसायिक ईटरीज और पक्की सड़कों का भी उल्लेख है। अधिकरण ने जिला-वार वेटलैंड की पहचान, जमीनी सत्यापन और मानचित्रण पर भी जोर दिया है। इतना ही नहीं, 2.25 हेक्टेयर से छोटे तालाब और जल संरचनाओं की पहचान और संरक्षण की जरूरत भी बताई गई है।

5.46 लाख हेक्टेयर वन भूमि के कब्जे का भी उल्लेख

सुनवाई में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा मार्च 2025 में प्रकाशित आंकड़ों का भी हवाला दिया गया। इनमें करीब 5,46,089.45 हेक्टेयर वन भूमि के अतिक्रमण की जानकारी सामने आई है। एनजीटी ने सार्वजनिक और पर्यावरणीय संपत्तियों को अतिक्रमण से बचाने के लिए प्रभावी व्यवस्था और समयबद्ध कार्रवाई की जरूरत बताई। साथ ही सार्वजनिक भूमि और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के सार्वजनिक न्यास सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा गया कि जल निकाय, तालाब और अन्य प्राकृतिक संसाधन जनता के हित में संरक्षित किए जाने चाहिए।

प्रदूषण बोर्ड को चार सप्ताह, 6 अक्टूबर को अगली सुनवाई

सुनवाई के दौरान मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से अंतरिम कार्रवाई रिपोर्ट पेश की गई। बोर्ड ने विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए चार सप्ताह का समय मांगा। अधिकरण ने अगली सुनवाई से पहले विस्तृत कार्रवाई रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं। दोनों मामलों की अगली सुनवाई 6 अक्टूबर 2026 को होगी। मामले में आवेदक राशिद नूर खान की ओर से अधिवक्ता हर्षवर्धन तिवारी ने पैरवी की।

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