State

प्रधानमंत्री राहत योजना का लाभ नहीं पहुंचा जरूरतमंदों तक? भोपाल में दुर्घटना पीड़ितों के उपचार पर उठे सवाल

भोपाल। सड़क दुर्घटनाओं में घायल लोगों को तत्काल और निःशुल्क उपचार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई केंद्र सरकार की राहत योजना का लाभ राजधानी भोपाल में अपेक्षित स्तर पर नहीं पहुंच पा रहा है। प्रशासनिक समीक्षा के दौरान यह तथ्य सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं। कलेक्टर की हालिया बैठक में इस मुद्दे पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई और संबंधित अधिकारियों से जवाब तलब किया गया।

जानकारी के अनुसार, दुर्घटना पीड़ितों के उपचार के लिए लागू योजना के तहत कई पात्र मामलों में लाभ नहीं दिए जाने की शिकायतें सामने आई हैं। यही कारण है कि जिला प्रशासन ने योजना के क्रियान्वयन की समीक्षा शुरू कर दी है।

दुर्घटना के “गोल्डन ऑवर” को बचाने के लिए बनाई गई व्यवस्था

सड़क दुर्घटनाओं में शुरुआती एक घंटा यानी गोल्डन ऑवर सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी दौरान उचित चिकित्सा मिलने पर गंभीर रूप से घायल व्यक्ति की जान बचाई जा सकती है। लेकिन अक्सर दुर्घटना के बाद घायल व्यक्ति के साथ कोई परिजन मौजूद नहीं होता या आर्थिक संसाधनों के अभाव में उपचार शुरू होने में देरी हो जाती है।

इसी चुनौती को देखते हुए केंद्र सरकार ने ऐसी व्यवस्था लागू की है जिसके तहत दुर्घटना में घायल व्यक्ति को तत्काल चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जा सके और उपचार के शुरुआती खर्च की चिंता अस्पताल या परिजनों को न करनी पड़े।

डेढ़ लाख रुपये तक उपचार खर्च का प्रावधान

योजना के तहत दुर्घटना में घायल व्यक्ति के इलाज के लिए 1.5 लाख रुपये तक की राशि उपलब्ध कराई जा सकती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अस्पताल आर्थिक कारणों से उपचार शुरू करने में देरी न करें।

विशेषज्ञों का मानना है कि सड़क हादसों में समय पर चिकित्सा उपलब्ध होने से मृत्यु दर और गंभीर जटिलताओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसलिए इस प्रकार की योजनाएं केवल आर्थिक सहायता नहीं बल्कि जीवन रक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम भी हैं।

शिकायतों के बावजूद लाभ नहीं मिलने पर प्रशासन सख्त

प्रशासनिक समीक्षा के दौरान यह बात सामने आई कि राजधानी में कुछ दुर्घटना पीड़ितों को योजना का लाभ नहीं मिला, जबकि वे इसके पात्र थे। इस संबंध में शिकायतें भी दर्ज हुईं, जिनमें से कुछ मामले मुख्यमंत्री हेल्पलाइन तक पहुंचे।

बैठक में अधिकारियों से पूछा गया कि यदि योजना लागू है तो लाभार्थियों तक उसका प्रभावी क्रियान्वयन क्यों नहीं हो रहा। प्रशासन का मानना है कि योजनाओं की घोषणा तभी सार्थक होती है जब उनका लाभ वास्तव में जरूरतमंदों तक पहुंचे।

जागरूकता की कमी भी बड़ी चुनौती

स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि कई बार अस्पताल कर्मियों, पुलिस अधिकारियों और आम नागरिकों को ऐसी योजनाओं की पूरी जानकारी नहीं होती। परिणामस्वरूप दुर्घटना पीड़ितों को उपलब्ध सहायता का उपयोग नहीं हो पाता।

विशेषज्ञों के अनुसार योजना की सफलता के लिए तीन स्तरों पर काम आवश्यक है—

अस्पतालों को स्पष्ट दिशा-निर्देश और प्रशिक्षण

पुलिस एवं आपातकालीन सेवाओं की जागरूकता

आम नागरिकों तक योजना की जानकारी का व्यापक प्रसार


30 मामलों की समीक्षा में सामने आईं खामियां

प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार दुर्घटना पीड़ितों से जुड़े कई मामलों की समीक्षा के दौरान यह पाया गया कि योजना के लाभ को लेकर समन्वय की कमी रही। इससे यह सवाल उठ रहा है कि जिन लोगों के लिए योजना बनाई गई थी, क्या वे वास्तव में उसके दायरे में आ पा रहे हैं।

योजनाओं की सफलता क्रियान्वयन पर निर्भर

सरकारी योजनाएं तभी प्रभावी मानी जाती हैं जब उनका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। दुर्घटना पीड़ितों के लिए बनाई गई यह राहत व्यवस्था जीवन बचाने की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में प्रशासन की प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि अस्पतालों, स्वास्थ्य विभाग और अन्य संबंधित एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो तथा किसी भी घायल व्यक्ति को आर्थिक कारणों से उपचार से वंचित न रहना पड़े।

भोपाल में सामने आए मामलों ने यह स्पष्ट किया है कि केवल योजना बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन, निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था भी उतनी ही आवश्यक है।

Related Articles