मोम के दीयों के साथ बुझती जा रही हैं ग्रामीण परंपराएँ

आलेख : डॉ निर्मला शर्मा
दीपावली आती है तो घर-आँगन दीयों की रोशनी से जगमगा उठते हैं, लेकिन इस जगमगाहट के बीच कुछ ऐसी परंपराएँ भी हैं, जिनकी लौ धीरे-धीरे मंद पड़ती जा रही हैं। कभी गाँव की दीपावली का अपना अलग ही सौंदर्य हुआ करता था। वह सौंदर्य बाजार की सजावट में नहीं, मिट्टी की सौंधी महक, पशुओं के गले में बंधे घुँघरुओं की रुनझुन और खेतों की मेड़ों पर टिमटिमाते दीयों की अवली में बसता था।
दीपावली से पहले घर की माँएँ आँगन को मिट्टी से लीपती थीं। गोबर और मिट्टी से लिपे उस आँगन में जब दीपक जलते थे, तो लगता था जैसे धरती ने स्वयं उत्सव का शृंगार कर लिया हो। माँ के हाथों से लीपे आँगन की वह सौंधी महक आज भी स्मृतियों में बसी है। धनतेरस के दिन सुबह पांडू और पीली मिट्टी लाई जाती थी, जो मिट्टी नहीं लक्ष्मी के रूप में घर में आती थी। उसके ‘पिंडोऴे’ बनाकर सहेज लिया जाता था। वर्षभर इसी मिट्टी से घर आंगन लीपे जाते थे। घर में गुड़ की मिठाइयाँ बनती थीं, उनकी खुशबू रसोई से निकलकर पूरे वातावरण में मिठास घोल देती थी। वह मिठास बाजार से खरीदी मिठाइयों में कहाँ! आज चमकदार डिब्बों में सजी मिठाइयों ने घर की रसोई में अपनी जगह बना ली है, लेकिन उनके साथ वह अपनापन, शुद्धता और घर में पकने वाली मिठास भी कहीं पीछे छूट गई है।
गाँवों में दीपावली का उत्सव मनुष्यों तक सीमित नहीं रहता था। गायों, बैलों और भैंसों को भी इस पर्व का हिस्सा बनाया जाता था। उनके गले में रस्सी से बने सुंदर मोहरे पहनाए जाते, सिंगों पर खूबसूरत रंग किया जाता था, गले में घुँघरू बाँधे जाते और जब वे चलते तो उनकी रुनझुन से पशुबाड़ा ही नहीं पूरा गांँव गूँज उठता था। पशुओं के प्रति यह स्नेह किसी दिखावे का हिस्सा नहीं था, वे परिवार और खेती-किसानी के अभिन्न सदस्य थे। उनकी सेवा और सम्मान भी उत्सव का हिस्सा हुआ करते थे। ये मवेशी जब दिन भर खेत पर रहने के बाद जब गोधूलि बेला में घर लौटते थे तो उनके खुरों से उड़ती हुई धूल और गले में बजते घुंघरू वातावरण में एक संगीत घोल देते थे। गोधूलि का वह दृश्य आज भी मन को तरंगित कर देता है।
रोड़ी, खेतों की मेड़ों, कुओं के जगत, मंदिरों और पशुओं के रहने के स्थानों पर दीपक रखे जाते थे। हर दीपक के पीछे कोई न कोई लोकविश्वास, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और समृद्धि की कामना जुड़ी होती थी। धरती, अन्न, जल और पशुधन के प्रति आभार व्यक्त करने का यह अपना देसी तरीका था। दीपावली घर की चारदीवारी से निकलकर खेत-खलिहानों तक पहुँचती थी।
समय बदला, गाँवों का स्वरूप बदला और गाँवों में भी शहरों जैसी जीवनशैली ने जगह बना ली। पक्के फर्श ने मिट्टी के आँगन की जगह ले ली, आधुनिक सजावट ने पारंपरिक शृंगार को पीछे छोड़ दिया और बाजार की मिठाइयों ने घर की रसोई का स्वाद बदल दिया। अब माँ और दादी के हाथ की हलवा- लपसी बहुत कम लोग पसंद करते हैं और अब न ही पशुओं के गले में पहले जैसी घुंघरुओं की रुनझुन सुनाई देती है और न खेतों की मेड़ों पर दीयों की वह कतार दिखाई देती है। विकास की इस दौड़ में हमने सुविधाएँ तो खूब जुटा लीं, लेकिन अपनी संस्कृति की छोटी-छोटी खुशियों को सहेजना भूलते जा रहे हैं।
परंपराएँ समय के साथ बदलती हैं, यह स्वाभाविक है, लेकिन उन परंपराओं से जुड़ी संवेदनाओं को खो देना हमारी सांस्कृतिक स्मृति का खो जाना है। मिट्टी का आँगन, गुड़ की मिठास, पशुओं के गले की रुनझुन और खेतों में जलते दीपक महज पुरानी रस्में नहीं थीं, वे हमारे ग्रामीण जीवन की पहचान थे।
इस दीपावली घरों में दीये जरूर जलाएँ, लेकिन उन परंपराओं की लौ भी जलाए रखें, जिनसे हमारी संस्कृति का उजाला बना है क्योंकि जिस दिन हमारी अगली पीढ़ी को मिट्टी की सौंधी महक, बैलों के घुँघरुओं की आवाज और खेतों की मेड़ों पर रखे दीपक का अर्थ बताने के लिए भी तस्वीरों का सहारा लेना पड़ेगा, उस दिन हम समझेंगे कि हमने आधुनिकता की रोशनी में अपनी विरासत का कितना कुछ खो दिया है।
*(लेखिका सहायक आचार्य हैं)*





