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भोपाल में लोक संस्कृति की गूंज: पद्मश्री Kaluram Bamaniya ने कबीर और मालवा के लोक स्वरों से बांधा समां

भोपाल । डिजिटल मनोरंजन और तेजी से बदलती सांस्कृतिक प्राथमिकताओं के दौर में जब लोक कलाएं धीरे-धीरे हाशिये पर जाती दिखाई देती हैं, ऐसे समय में भोपाल में आयोजित एक लोक गायन संध्या ने यह साबित किया कि भारतीय लोक संगीत आज भी लोगों की संवेदनाओं और सांस्कृतिक स्मृतियों में जीवित है।

Kalavyom Foundation द्वारा शुरू की गई मासिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों की श्रृंखला का उद्घाटन केवल एक संगीत आयोजन नहीं था, बल्कि भारतीय लोक परंपरा, कबीर दर्शन और सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का गंभीर प्रयास भी था। कार्यक्रम का आयोजन भोपाल के बाग मुगलिया स्थित कुबेर बैंक्वेट में किया गया, जिसमें लोक संगीत प्रेमियों, साहित्यकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और कला अनुरागियों की बड़ी उपस्थिति देखने को मिली।

कबीर के निर्गुण में डूबी सांस्कृतिक संध्या

इस आयोजन का सबसे बड़ा आकर्षण पद्मश्री सम्मानित लोक गायक Kaluram Bamaniya की प्रस्तुति रही। मालवा की मिट्टी से जुड़े उनके स्वर जब कबीर के निर्गुण भजनों के साथ सभागार में गूंजे, तो वातावरण आध्यात्मिक और लोक चेतना से भर उठा।

“मन लागो मेरो यार फकीरी में…” और “उड़ जाएगा हंस अकेला…” जैसे भजनों की प्रस्तुति ने श्रोताओं को केवल संगीत का आनंद नहीं दिया, बल्कि जीवन दर्शन और वैराग्य की उस परंपरा से भी जोड़ा, जिसकी जड़ें भारतीय संत परंपरा में गहराई तक फैली हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि कबीर गायन केवल संगीत नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद का माध्यम भी है। इसमें भक्ति, दर्शन, सामाजिक समानता और जीवन की नश्वरता का संदेश लोकभाषा में सहज रूप से सामने आता है। यही कारण है कि निर्गुण लोक गायन आज भी ग्रामीण भारत से लेकर शहरी सांस्कृतिक मंचों तक अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है।

लोक संगीत क्यों महत्वपूर्ण है?

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित चिंतक Amogh Gupta ने अपने वक्तव्य में लोक संगीत को “समाज की सांस्कृतिक स्मृति” बताया। उनका कहना था कि लोक कलाएं केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि किसी समाज के इतिहास, संघर्ष, परंपराओं और सामूहिक चेतना का जीवंत दस्तावेज होती हैं।

वास्तव में भारतीय लोक संगीत की सबसे बड़ी विशेषता उसकी जड़ों से जुड़ाव है। मालवा, बुंदेलखंड, बघेलखंड, निमाड़ या राजस्थान—हर क्षेत्र का लोक संगीत वहां के जनजीवन, कृषि, ऋतुचक्र, अध्यात्म और सामाजिक संरचना को अभिव्यक्त करता है।

सांस्कृतिक विरासत केवल स्मारकों में नहीं

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पुरातत्वविद् Narayan Vyas ने एक महत्वपूर्ण बात कही कि भारतीय संस्कृति केवल पुरातात्विक धरोहरों और स्मारकों तक सीमित नहीं है। लोक गीत, लोक कथाएं और मौखिक परंपराएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण सांस्कृतिक विरासत हैं।

यह टिप्पणी आज के संदर्भ में विशेष महत्व रखती है, क्योंकि तेजी से बढ़ते शहरीकरण और डिजिटल संस्कृति के प्रभाव में कई लोक परंपराएं विलुप्ति के खतरे का सामना कर रही हैं। कई लोक कलाकार आर्थिक कठिनाइयों और मंचों की कमी के कारण अपनी कला को आगे नहीं बढ़ा पा रहे।

भोपाल की सांस्कृतिक पहचान को नई ऊर्जा

भोपाल लंबे समय से भारत के प्रमुख सांस्कृतिक शहरों में गिना जाता रहा है। भारत भवन, रंगमंडल, लोक कला आयोजन और साहित्यिक गतिविधियों ने शहर को एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान दी है। ऐसे में कलाव्योम फाउंडेशन जैसी संस्थाओं द्वारा नियमित मासिक कार्यक्रम शुरू करना शहर की सांस्कृतिक सक्रियता को नई ऊर्जा देने वाला कदम माना जा रहा है।

संस्था से जुड़े Alok Sharma ने बताया कि भविष्य में संगीत, नाट्य, नृत्य और लोक कलाओं पर आधारित और भी आयोजन किए जाएंगे, जिनमें युवा कलाकारों को मंच देने पर विशेष जोर रहेगा।

नई पीढ़ी और लोक संस्कृति के बीच पुल

सांस्कृतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लोक कलाओं को आधुनिक मंचों, डिजिटल दस्तावेजीकरण और शैक्षणिक संस्थानों से जोड़ा जाए, तो नई पीढ़ी में इनके प्रति रुचि बढ़ सकती है।

आज जब मनोरंजन का बड़ा हिस्सा एल्गोरिदम आधारित डिजिटल कंटेंट में बदल रहा है, तब ऐसे आयोजनों की भूमिका और बढ़ जाती है। वे समाज को यह याद दिलाते हैं कि संस्कृति केवल “कंटेंट” नहीं, बल्कि सामूहिक अनुभव और पहचान का हिस्सा होती है।

भोपाल में आयोजित यह लोक गायन संध्या इसी अर्थ में महत्वपूर्ण रही—जहां संगीत केवल प्रस्तुति नहीं था, बल्कि भारतीय लोक आत्मा की जीवंत अभिव्यक्ति बनकर सामने आया।

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