विश्व तंबाकू निषेध दिवस से पहले भोपाल में आयुर्वेद आधारित नशा मुक्ति अभियान, युवाओं में बढ़ती लत पर विशेषज्ञों की चिंता

Bhopal में विश्व तंबाकू निषेध दिवस से पहले नशे की बढ़ती समस्या को लेकर एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य पहल शुरू हुई है। Pt. Khushilal Sharma Government Ayurveda College and Institute में तीन दिवसीय विशेष नशा मुक्ति शिविर की शुरुआत की गई, जहां पहले ही दिन 50 से अधिक लोगों ने परामर्श और उपचार सेवाएं लीं।

यह शिविर केवल औपचारिक जागरूकता कार्यक्रम नहीं, बल्कि उस गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट की ओर संकेत है जो धीरे-धीरे युवाओं, कामकाजी वर्ग और किशोरों तक फैलता जा रहा है। खास बात यह है कि इस अभियान में आयुर्वेद, काउंसलिंग और व्यवहार परिवर्तन को एक साथ जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

तंबाकू और नशे की लत अब केवल “आदत” नहीं, सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदा

भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां धूम्रपान और तंबाकू सेवन से होने वाली बीमारियों का बोझ लगातार बढ़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार सिगरेट, गुटखा, शराब और अन्य नशे की लत अब केवल व्यक्तिगत व्यवहार का मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह हृदय रोग, कैंसर, मानसिक तनाव और उत्पादकता में गिरावट जैसी बड़ी समस्याओं से जुड़ चुकी है।

इसी पृष्ठभूमि में 31 मई को मनाए जाने वाले World No Tobacco Day से पहले भोपाल में आयोजित यह शिविर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

आयुर्वेद और आधुनिक मूल्यांकन पद्धति का संयोजन

महाविद्यालय के अगदतंत्र विभाग द्वारा आयोजित इस शिविर में रोगियों का मूल्यांकन केवल सामान्य बातचीत के आधार पर नहीं किया जा रहा, बल्कि “फेगरस्ट्रॉम टेस्ट” और “ऑडिट स्केल” जैसी मानक पद्धतियों का उपयोग किया जा रहा है।

फेगरस्ट्रॉम टेस्ट आमतौर पर निकोटीन निर्भरता की गंभीरता मापने के लिए उपयोग किया जाता है, जबकि AUDIT स्केल शराब सेवन से जुड़े जोखिमों का आकलन करने में मदद करता है। इसके आधार पर मरीजों को अलग-अलग स्तर की काउंसलिंग, औषधीय उपचार और पंचकर्म संबंधी सलाह दी जा रही है।

अगदतंत्र विभाग की विभागाध्यक्ष Dr. Urmila Shukla के अनुसार कई मरीज ऐसे सामने आ रहे हैं जो वर्षों से तंबाकू या शराब की लत से जूझ रहे हैं लेकिन सामाजिक झिझक के कारण उपचार नहीं लेते।

क्यों बढ़ रही है नशे की समस्या?

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि तनाव, बेरोजगारी, सोशल मीडिया प्रभाव और बदलती जीवनशैली नशे की लत को बढ़ाने वाले प्रमुख कारण बन रहे हैं। कोविड महामारी के बाद कई अध्ययनों में यह सामने आया कि युवाओं में निकोटीन और शराब का सेवन बढ़ा है।

भोपाल सहित मध्यप्रदेश के शहरी क्षेत्रों में ई-सिगरेट, फ्लेवर निकोटीन उत्पाद और वेपिंग जैसी नई प्रवृत्तियां भी चिंता का विषय बन रही हैं। हालांकि भारत में ई-सिगरेट पर प्रतिबंध है, फिर भी इनका अवैध उपयोग पूरी तरह नहीं रुका है।

सिर्फ इलाज नहीं, व्यवहार परिवर्तन भी जरूरी

विशेषज्ञों का कहना है कि नशा मुक्ति का सबसे कठिन हिस्सा दवाइयां नहीं, बल्कि व्यवहार परिवर्तन होता है। यही कारण है कि इस शिविर में रोगियों को मानसिक समर्थन, जीवनशैली सुधार और परिवार आधारित सहयोग पर भी जोर दिया जा रहा है।

आयुर्वेदिक विशेषज्ञों के अनुसार पंचकर्म, ध्यान, नियंत्रित आहार और औषधीय सहायता कुछ मामलों में निकोटीन व शराब छोड़ने की प्रक्रिया को आसान बना सकते हैं, हालांकि गंभीर मामलों में मनोचिकित्सकीय सहायता भी आवश्यक होती है।

आने वाले समय में ऐसे शिविर क्यों होंगे अहम?

भारत में गैर-संचारी रोगों का बढ़ता बोझ स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। तंबाकू और शराब इससे जुड़े प्रमुख जोखिम कारक हैं। ऐसे में स्थानीय स्तर पर चलने वाले नशा मुक्ति शिविर केवल उपचार केंद्र नहीं, बल्कि “प्रिवेंटिव हेल्थ मॉडल” के रूप में भी देखे जा रहे हैं।

भोपाल में शुरू हुआ यह अभियान संकेत देता है कि आने वाले समय में आयुष संस्थानों की भूमिका केवल पारंपरिक उपचार तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वे मानसिक स्वास्थ्य, जीवनशैली रोग और व्यसन मुक्ति जैसे क्षेत्रों में भी सक्रिय भागीदारी निभाएंगे।

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