गेहूं खरीद में मध्यप्रदेश ने बनाया रिकॉर्ड: 103 लाख मीट्रिक टन उपार्जन के पीछे क्या है बड़ी कृषि और राजनीतिक रणनीति?

Madhya Pradesh ने इस वर्ष न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर गेहूं खरीदी में नया रिकॉर्ड बनाते हुए देश में शीर्ष स्थान हासिल किया है।

प्रदेश में अब तक 13.36 लाख किसानों से 103.48 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदा जा चुका है। इनमें 8 लाख से अधिक सीमांत और लघु किसान शामिल हैं, जिनसे 32 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा गेहूं खरीदा गया।

राज्य सरकार के अनुसार किसानों को अब तक 22,842 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान भी किया जा चुका है।

कृषि विशेषज्ञ इसे केवल “रिकॉर्ड खरीदी” नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश की बदलती कृषि अर्थव्यवस्था, खाद्यान्न राजनीति और सरकारी खरीद तंत्र की बड़ी कहानी मान रहे हैं।

कैसे बना मध्यप्रदेश देश का “व्हीट पावरहाउस”?

एक समय पंजाब और हरियाणा को देश की गेहूं खरीद व्यवस्था का केंद्र माना जाता था। लेकिन पिछले डेढ़ दशक में मध्यप्रदेश ने तेजी से अपनी स्थिति मजबूत की है।

इसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं:

सिंचाई क्षेत्र में विस्तार

उच्च उत्पादकता वाली गेहूं किस्में

समर्थन मूल्य आधारित सरकारी खरीद

ग्रामीण सड़क और मंडी नेटवर्क

बोनस नीति

बड़े पैमाने पर पंजीयन प्रणाली


विशेषज्ञों के अनुसार मालवा, नर्मदांचल और बुंदेलखंड के कई हिस्सों में गेहूं उत्पादन में लगातार वृद्धि ने राज्य को राष्ट्रीय खाद्यान्न मानचित्र पर मजबूत बनाया है।

रिकॉर्ड खरीद के पीछे बोनस की भूमिका

इस वर्ष किसानों को:

₹2585 प्रति क्विंटल MSP

₹40 प्रति क्विंटल राज्य बोनस


मिलाकर कुल ₹2625 प्रति क्विंटल का भुगतान किया जा रहा है।

कृषि अर्थशास्त्रियों का कहना है कि बोनस नीति किसानों को निजी व्यापारियों के बजाय सरकारी खरीद केंद्रों की ओर आकर्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

हालांकि कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि लंबे समय तक बोनस आधारित मॉडल राज्य के वित्तीय बोझ को बढ़ा सकता है।

छोटे किसानों पर सरकार का विशेष फोकस

सरकारी आंकड़ों के अनुसार खरीदी में बड़ी हिस्सेदारी सीमांत और लघु किसानों की रही है।

यह राजनीतिक और सामाजिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है, क्योंकि मध्यप्रदेश की कृषि संरचना मुख्यतः छोटे जोत वाले किसानों पर आधारित है।

विशेषज्ञों के अनुसार MSP आधारित खरीद छोटे किसानों को बाजार की कीमतों में गिरावट से बचाने का सुरक्षा कवच देती है।

क्या इतनी बड़ी खरीद व्यवस्था आसान होती है?

103 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदना केवल प्रशासनिक घोषणा नहीं, बल्कि विशाल लॉजिस्टिक ऑपरेशन है।

इसके लिए:

खरीद केंद्र संचालन

तौल व्यवस्था

बारदाना उपलब्धता

भंडारण

परिवहन

भुगतान प्रणाली


जैसी कई व्यवस्थाओं का समन्वय जरूरी होता है।

राज्य सरकार ने इस बार तौल कांटों की संख्या बढ़ाने, स्लॉट बुकिंग व्यवस्था और देर रात तक भुगतान प्रक्रिया जैसी व्यवस्थाएं लागू कीं।

लेकिन चुनौतियां अब भी मौजूद हैं

विशेषज्ञों का कहना है कि रिकॉर्ड खरीद के बावजूद कई संरचनात्मक चुनौतियां बनी हुई हैं:

1. भंडारण क्षमता का दबाव

इतनी बड़ी मात्रा में अनाज संग्रहण के लिए पर्याप्त गोदाम और वैज्ञानिक स्टोरेज जरूरी होता है।

2. जल संकट

मध्यप्रदेश में गेहूं उत्पादन बढ़ने के साथ भूजल दोहन भी तेजी से बढ़ा है। कई कृषि विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि जल-आधारित खेती मॉडल लंबे समय में टिकाऊ नहीं रह सकता।

3. फसल विविधीकरण की कमी

MSP आधारित गेहूं और धान खरीद के कारण किसान अन्य फसलों की तुलना में इन्हीं पर अधिक निर्भर होते जा रहे हैं।

कृषि राजनीति में क्यों महत्वपूर्ण है यह उपलब्धि?

Mohan Yadav सरकार के लिए यह रिकॉर्ड खरीदी राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार मध्यप्रदेश की ग्रामीण राजनीति में गेहूं खरीद और समय पर भुगतान बड़ा मुद्दा होता है।

इस वर्ष केंद्र द्वारा निर्धारित 78 लाख मीट्रिक टन लक्ष्य को बढ़ाकर 100 लाख मीट्रिक टन करवाना और फिर उससे आगे निकलना सरकार के लिए “किसान समर्थक प्रशासन” की छवि मजबूत करने का अवसर बन गया है।

क्या मध्यप्रदेश नया कृषि मॉडल बन रहा है?

विशेषज्ञों का मानना है कि मध्यप्रदेश अब केवल “उत्पादन आधारित कृषि राज्य” नहीं, बल्कि “सरकारी खरीद आधारित कृषि अर्थव्यवस्था” की ओर बढ़ रहा है।

यदि राज्य आने वाले वर्षों में:

सिंचाई दक्षता

फसल विविधीकरण

वैल्यू एडिशन

एग्री-लॉजिस्टिक्स

खाद्य प्रसंस्करण


पर समानांतर काम करता है, तो वह देश के सबसे प्रभावशाली कृषि राज्यों में स्थायी रूप से अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है।

फिलहाल, रिकॉर्ड गेहूं खरीदी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था में मध्यप्रदेश की भूमिका अब पहले से कहीं अधिक केंद्रीय हो चुकी है।

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