आयरलैंड में गूंजा एम्स भोपाल का शोध: मेलियोइडोसिस पर भारतीय अध्ययन ने खींचा वैश्विक ध्यान

All India Institute of Medical Sciences Bhopal की पीएचडी शोधार्थी Malti Dadhich ने आयरलैंड में आयोजित यूरोपियन मेलियोइडोसिस कांग्रेस 2026 में अपने शोध की प्रस्तुति देकर मध्य भारत में उभरती एक गंभीर लेकिन कम चर्चित बीमारी को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहुंचाया है।

इस उपलब्धि के लिए उन्हें Anusandhan National Research Foundation द्वारा इंटरनेशनल ट्रैवल ग्रांट भी प्रदान किया गया।

विशेषज्ञों के अनुसार यह उपलब्धि केवल व्यक्तिगत अकादमिक सफलता नहीं, बल्कि भारत में उभरते “इन्फेक्शियस डिजीज रिसर्च इकोसिस्टम” का संकेत भी है।

क्या है मेलियोइडोसिस और क्यों बढ़ रही चिंता?

मेलियोइडोसिस एक गंभीर बैक्टीरियल संक्रमण है, जो Melioidosis के नाम से जाना जाता है।

यह संक्रमण Burkholderia pseudomallei नामक बैक्टीरिया से होता है, जो आमतौर पर मिट्टी और पानी में पाया जाता है, खासकर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में।

\text{Burkholderia pseudomallei} \rightarrow \text{Melioidosis Infection}

विशेषज्ञों का कहना है कि यह बीमारी अक्सर तपेदिक (TB), निमोनिया या सामान्य बुखार जैसी दिखती है, जिससे इसका सही निदान देर से हो पाता है। कई मामलों में संक्रमण जानलेवा भी हो सकता है।

किन लोगों में अधिक खतरा?

शोध और चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार यह संक्रमण विशेष रूप से इन लोगों में अधिक गंभीर हो सकता है:

मधुमेह रोगी

किडनी या फेफड़ों की पुरानी बीमारी वाले मरीज

कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले लोग

अत्यधिक शराब सेवन करने वाले व्यक्ति

किसान और मिट्टी-पानी के लगातार संपर्क में रहने वाले लोग


मध्य भारत जैसे कृषि प्रधान क्षेत्रों में यह बीमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।

एम्स भोपाल के शोध में क्या खास?

यह अध्ययन वर्ष 2022 से 2024 के बीच AIIMS Bhopal Department of Microbiology में डायग्नोस किए गए मरीजों पर आधारित था।

शोध में केवल क्लीनिकल विश्लेषण ही नहीं, बल्कि बैक्टीरिया का “Whole Genome Sequencing” भी किया गया।

विशेषज्ञों के अनुसार जीनोमिक अध्ययन से यह समझने में मदद मिलती है कि संक्रमण किस प्रकार फैल रहा है, उसकी आक्रामकता कितनी है और भविष्य में एंटीबायोटिक प्रतिरोध जैसी चुनौतियां कितनी गंभीर हो सकती हैं।

यह शोध Ayush Gupta के मार्गदर्शन में किया गया।

भारत में क्यों कम पहचानी जाती है यह बीमारी?

संक्रामक रोग विशेषज्ञों के अनुसार भारत में मेलियोइडोसिस लंबे समय तक “अंडरडायग्नोस्ड डिजीज” रही है।

कारण:

सीमित जागरूकता

टीबी जैसे लक्षण

ग्रामीण क्षेत्रों में जांच सुविधाओं की कमी

डॉक्टरों में कम पहचान

माइक्रोबायोलॉजिकल टेस्टिंग का अभाव


विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक मामलों की संख्या रिपोर्ट किए गए आंकड़ों से कहीं अधिक हो सकती है।

जलवायु परिवर्तन और संक्रमण का नया खतरा

वैश्विक स्वास्थ्य विशेषज्ञ अब मेलियोइडोसिस को जलवायु परिवर्तन से जुड़ी उभरती बीमारियों में भी शामिल करने लगे हैं।

अत्यधिक वर्षा, बाढ़ और मिट्टी-पानी के बढ़ते संपर्क से संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ सकता है।

भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देश में यह भविष्य की सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन सकती है।

क्यों महत्वपूर्ण है अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह प्रस्तुति?

European Melioidosis Congress 2026 में भारतीय शोध की प्रस्तुति कई मायनों में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

इससे:

मध्य भारत में बीमारी की मौजूदगी पर वैश्विक ध्यान गया

भारतीय शोध संस्थानों की क्षमता सामने आई

भविष्य में अंतरराष्ट्रीय सहयोग और संयुक्त अध्ययन की संभावना बढ़ी

क्षेत्रीय रोगों पर डेटा आधारित शोध को प्रोत्साहन मिला


एम्स भोपाल की बढ़ती शोध पहचान

पिछले कुछ वर्षों में AIIMS Bhopal केवल चिकित्सा सेवा संस्थान नहीं, बल्कि रिसर्च आधारित मेडिकल सेंटर के रूप में भी अपनी पहचान मजबूत कर रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार मेडिकल रिसर्च में क्षेत्रीय बीमारियों पर अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि भारत जैसे विविध जलवायु और सामाजिक परिस्थितियों वाले देश में रोग पैटर्न अलग-अलग हो सकते हैं।

मेलियोइडोसिस पर यह अध्ययन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जो भविष्य में बेहतर निदान, उपचार और सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति निर्माण में उपयोगी साबित हो सकता है।

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