AIIMS भोपाल के अध्ययन में बच्चों की दुर्लभ किडनी बीमारी का भारतीय आनुवंशिक स्वरूप सामने आया

भोपाल। बच्चों में होने वाली दुर्लभ किडनी बीमारी डिस्टल रीनल ट्यूब्यूलर एसिडोसिस (dRTA) को लेकर भारत में किए गए बहुकेंद्रीय अध्ययन में महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। अध्ययन के अनुसार भारतीय बच्चों में इस बीमारी का प्रमुख आनुवंशिक कारण SLC4A1 जीन में बदलाव है। यह आनुवंशिक स्वरूप पश्चिमी देशों में सामने आए आंकड़ों से अलग पाया गया है। शोध के निष्कर्ष Pediatric Nephrology जर्नल में प्रकाशित हुए हैं।

यह अध्ययन भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के दुर्लभ रोग कार्यबल के तहत किया गया। ICMR ने अध्ययन को वित्तीय सहयोग दिया, जबकि एम्स भोपाल इसका समन्वय केंद्र रहा। अध्ययन में वर्ष 2020 से 2024 के बीच dRTA से पुष्टि वाले 91 बच्चों को शामिल किया गया।

61.5% बच्चों में मिले बीमारी से जुड़े आनुवंशिक बदलाव

आनुवंशिक जांच में 61.5 प्रतिशत बच्चों में बीमारी का कारण बनने वाले या संभावित कारण माने जाने वाले बदलाव पाए गए। आनुवंशिक कारण की पहचान वाले बच्चों में 51.7 प्रतिशत मामलों में SLC4A1 प्रमुख कारण रहा। इसके बाद ATP6V1B1 से जुड़े 21.4 प्रतिशत, ATP6V0A4 से जुड़े 14.2 प्रतिशत और WDR72 से जुड़े 12.5 प्रतिशत मामले सामने आए। अध्ययन में 12 नए आनुवंशिक बदलावों की भी पहचान हुई।

शोधकर्ताओं के अनुसार SLC4A1 जीन से जुड़े बदलावों की अधिक संख्या भारतीय बच्चों में इस बीमारी के अलग आनुवंशिक स्वरूप की ओर संकेत करती है। इससे भारत में बीमारी की आनुवंशिक जांच और परिवारों को आनुवंशिक परामर्श देने में मदद मिल सकती है।

बीमारी की पहचान में हुई देरी

अध्ययन में बीमारी की पहचान में देरी भी सामने आई। बच्चों में लक्षण औसतन 1.5 वर्ष की उम्र में शुरू हुए, लेकिन बीमारी का निदान औसतन 8.8 वर्ष की उम्र में हुआ। SLC4A1 से जुड़े मामलों में निदान की औसत उम्र 11.3 वर्ष रही, जबकि WDR72 से जुड़े बच्चों में यह 15.2 वर्ष थी।

देर से पहचान का असर बच्चों की वृद्धि और हड्डियों पर भी पड़ा। अध्ययन में 75.8 प्रतिशत बच्चों की लंबाई उम्र के हिसाब से कम थी, जबकि 61.5 प्रतिशत में गंभीर लंबाई की कमी पाई गई। वहीं 57.1 प्रतिशत बच्चों में सूखा रोग, 38.5 प्रतिशत में हड्डियों की विकृति और 74.7 प्रतिशत में गुर्दों में कैल्शियम जमा होने की समस्या मिली।

समय पर उपचार से वृद्धि में सुधार

प्रधान अन्वेषक डॉ. गिरीश चंद्र भट्ट ने कहा कि dRTA दुर्लभ बीमारी है, लेकिन देर से पहचान होने पर इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। बच्चे की लंबाई का ठीक से न बढ़ना, अत्यधिक प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, बिना स्पष्ट कारण पोटैशियम की कमी, सूखा रोग और गुर्दों में कैल्शियम जमा होना ऐसे संकेत हैं, जिन पर चिकित्सकों को इस बीमारी की संभावना पर विचार करना चाहिए।

अध्ययन में पाया गया कि क्षार उपचार शुरू करने के बाद बच्चों की वृद्धि में सुधार हुआ। दो साल के दौरान बच्चों की लंबाई से संबंधित औसत स्कोर -3.61 से सुधरकर -2.87 हुआ। इससे संकेत मिलता है कि समय पर बीमारी की पहचान और उचित उपचार से रुकी हुई वृद्धि में सुधार की संभावना रहती है।

अध्ययन में 16.5 प्रतिशत बच्चों में क्रॉनिक किडनी डिजीज की स्टेज 2 या उससे अधिक अवस्था भी पाई गई। हालांकि निगरानी अवधि में कोई बच्चा स्टेज 5 तक नहीं पहुंचा। शोधकर्ताओं ने बच्चों की लंबे समय तक निगरानी की जरूरत बताई है।

अध्ययन का निष्कर्ष है कि भारतीय बच्चों में dRTA की समय पर पहचान के लिए देश-विशिष्ट आनुवंशिक जानकारी महत्वपूर्ण है। यदि बच्चे की वृद्धि नहीं हो रही है या लगातार प्यास, बार-बार पेशाब, हड्डियों की समस्या, पोटैशियम की कमी अथवा गुर्दों में कैल्शियम जमा होने जैसे संकेत मिलते हैं, तो चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी है। समय पर निदान और उपचार से गंभीर जटिलताओं को कम किया जा सकता है।

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