भोपाल। सोसाइटी फॉर रिगोरस योगा साइंस (SRYS) के साप्ताहिक ऑनलाइन शोध सत्र में एम्स भोपाल के शरीर क्रिया विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. वरुण मल्होत्रा ने योगाभ्यासों के स्वायत्त तंत्रिका तंत्र पर प्रभाव और हृदय गति परिवर्तनशीलता (HRV) से जुड़े शोध निष्कर्ष साझा किए।
उन्होंने “योगाभ्यासों के स्वायत्त प्रभाव: हृदय गति परिवर्तनशीलता अनुसंधान से प्राप्त प्रमाण” विषय पर व्याख्यान दिया। सत्र में देश के विभिन्न संस्थानों से 20 से अधिक शोधकर्ता और विद्यार्थी शामिल हुए।
अनुलोम-विलोम और धीमी श्वास पर चर्चा
डॉ. मल्होत्रा ने बताया कि HRV स्वायत्त तंत्रिका तंत्र की गतिविधि को समझने का महत्वपूर्ण संकेतक है। उन्होंने एम्स भोपाल की शोध टीम द्वारा विभिन्न योगाभ्यासों पर किए गए अध्ययनों के निष्कर्ष भी प्रस्तुत किए।
उन्होंने धीमी गहरी श्वास और अनुलोम-विलोम से जुड़े शोधों का उल्लेख करते हुए बताया कि इनमें पैरासिम्पेथेटिक गतिविधि और HRV में बदलाव देखे गए हैं। वहीं, कपालभाति से सिम्पेथेटिक गतिविधि में वृद्धि से जुड़े शोध निष्कर्ष साझा किए गए। सूर्य नमस्कार के दौरान शारीरिक ऊर्जा और सिम्पेथेटिक गतिविधि में बदलाव तथा हृदय स्वास्थ्य और लचीलेपन से जुड़े संभावित लाभों पर भी चर्चा हुई।
मधुमेह पर योग के अध्ययन के निष्कर्ष
डॉ. मल्होत्रा ने टाइप-2 मधुमेह से जुड़े एक अध्ययन के निष्कर्ष भी साझा किए। उनके अनुसार, 40 दिनों के योगाभ्यास के बाद अध्ययन में शामिल लोगों के वजन, बॉडी मास इंडेक्स (BMI) और कमर-कूल्हे के अनुपात जैसे शारीरिक मापदंडों में सुधार देखा गया।
उन्होंने योग को शरीर की संरचना और चयापचय स्वास्थ्य के लिए संभावित रूप से उपयोगी बताते हुए वैज्ञानिक शोध की आवश्यकता पर जोर दिया।
तनाव और मानसिक स्वास्थ्य पर भी चर्चा
सत्र में श्वास और मानसिक अवस्थाओं के बीच संबंध को भी समझाया गया। डॉ. मल्होत्रा ने बताया कि धीमी श्वास शांत अवस्था और एकाग्रता से जुड़ी हो सकती है, जबकि तेज श्वास भय और क्रोध जैसी भावनात्मक अवस्थाओं में देखी जा सकती है।
उन्होंने तनाव, चिंता और अवसाद के प्रबंधन में योग की संभावित भूमिका, न्यूरोप्लास्टिसिटी और मस्तिष्क के डिफॉल्ट मोड नेटवर्क से जुड़े शोधों पर भी चर्चा की। कोविड-19 अवधि के दौरान किए गए एक DST-Syam कोविड-19 अध्ययन का उल्लेख करते हुए उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य पर भय के प्रभाव को समझाया।
योग और आधुनिक विज्ञान के बीच संबंध
व्याख्यान में भगवद्गीता में वर्णित एकाग्रता और ध्यान की अवधारणाओं को आधुनिक शोध के संदर्भ में भी समझाया गया। हांग-सॉ और ओम तकनीक जैसी ध्यान विधियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आंतरिक शांति और आनंद की खोज व्यक्ति के भीतर से शुरू होती है।
कार्यक्रम के अंत में प्रश्नोत्तर सत्र हुआ। प्रतिभागियों ने HRV शोध पद्धति, रीढ़ की जैव-यांत्रिकी और योग अनुसंधान के भविष्य से जुड़े सवाल पूछे। डॉ. मल्होत्रा ने वैज्ञानिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण से उनके जवाब दिए।
सत्र में देशभर के शोधार्थियों और विद्यार्थियों को पारंपरिक योग ज्ञान और आधुनिक शरीर क्रिया विज्ञान के बीच संबंध को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने का अवसर मिला।
