युवाओं को बताया गुरु-शिष्य परंपरा और शिक्षक के महत्व

भोपाल। विद्यार्थियों को भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा और छात्र जीवन में शिक्षक के महत्व से परिचित कराने के उद्देश्य से भारतीय शिक्षण मंडल मध्य भारत प्रांत की ओर से विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में 571 व्यास पूजन कार्यक्रम आयोजित किए गए। इन कार्यक्रमों के माध्यम से विद्यार्थियों में शिक्षकों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और आत्मीय संबंध की भावना विकसित करने का प्रयास किया गया।

भारतीय शिक्षण मंडल मध्य भारत प्रांत के अध्यक्ष प्रो. हरिहर बसंत गुप्ता ने बताया कि व्यास पूजा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। आषाढ़ माह की पूर्णिमा को मनाई जाने वाली व्यास पूर्णिमा महर्षि वेद व्यास की जयंती के रूप में भी मनाई जाती है। यह दिन भारतीय परंपरा में गुरु-शिष्य संबंध और गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

उन्होंने बताया कि व्यास पूजा के दौरान आचार्यों के तीन समूहों की पूजा का विधान बताया गया है। इन्हें कृष्ण पंचकम, व्यास पंचकम और शंकराचार्य पंचकम के रूप में जाना जाता है।

महर्षि वेद व्यास की जयंती

भारतीय आध्यात्मिक और पौराणिक परंपरा के अनुसार महर्षि कृष्णद्वैपायन वेद व्यास का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को माना जाता है। इसी कारण इस दिन को व्यास जयंती और व्यास पूर्णिमा के रूप में मनाने की परंपरा रही है। महर्षि वेद व्यास को महाभारत के रचयिता के रूप में जाना जाता है। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए व्यास पूजन किया जाता है।

इन जिलों में हुए व्यास पूजन

मध्य भारत प्रांत के अंतर्गत भोपाल में 58, रायसेन में 40, सीहोर में 25, विदिशा में 48, हरदा में 30, बैतूल में 40, नर्मदापुरम में 30, राजगढ़ में 20, अशोकनगर में 25, गुना में 43, ग्वालियर में 144, भिंड में 10, मुरैना में 5 और शिवपुरी में 10 व्यास पूजन कार्यक्रम आयोजित किए गए।

संगठन के अनुसार, शैक्षणिक संस्थानों में आयोजित इन कार्यक्रमों का उद्देश्य शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच आत्मीय संबंध तथा परस्पर सम्मान की भावना को मजबूत करना है। इससे विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान परंपरा और जीवन में गुरु के महत्व को समझने का अवसर मिलता है।

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