कभी संकोच की भाषा रही हिंदी, आज सम्मान और आत्मविश्वास की पहचान : श्रीकृष्ण जूगनू

हिंदी सप्ताह में ‘हिंदी : संकोच से सम्मान तक’ विषय पर वरिष्ठ साहित्यकार ने रखे विचार

उदयपुर। हिंदी ने लंबे संघर्ष और अनेक चुनौतियों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई है। एक समय हिंदी बोलने में लोग संकोच महसूस करते थे, लेकिन आज यही भाषा सम्मान, आत्मविश्वास और अपनी बात प्रभावी ढंग से रखने का माध्यम बन रही है। यह बात वरिष्ठ साहित्यकार श्रीकृष्ण जूगनू ने हिंदी सप्ताह के तहत आयोजित कार्यक्रम में कही।

विद्या भवन रूरल इंस्टीट्यूट और राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में श्री जूगनू ने ‘हिंदी : संकोच से सम्मान तक’ विषय पर विचार रखे। उन्होंने हिंदी के विकास और उसके संघर्ष से जुड़े ऐतिहासिक एवं साहित्यिक प्रसंगों का उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि हिंदी का आज का स्वरूप लंबे भाषायी और सांस्कृतिक विकास का परिणाम है। भारतीय भाषाओं और लिपियों की समृद्ध परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने नंदिनागरी यानी नंदी लिपि से जुड़े विभिन्न संदर्भ भी सामने रखे। उन्होंने कहा कि भारत की भाषायी विरासत विविध और समृद्ध है, जिसे समझने और संरक्षित करने की जरूरत है।

श्री जूगनू ने कहा कि हिंदी को केवल बातचीत की भाषा तक सीमित नहीं रखना चाहिए। इसे ज्ञान, शिक्षा, साहित्य और शोध की भाषा के रूप में लगातार विकसित करने की आवश्यकता है। उन्होंने हिंदी के अतीत से लेकर वर्तमान और भविष्य तक की यात्रा को सामने रखते हुए भाषा के प्रति गौरव और आत्मविश्वास का संदेश दिया।

भाषा और संस्कृति पर गर्व जरूरी

राजस्थान साहित्य अकादमी के सचिव डॉ. वसंत सिंह सोलंकी ने कहा कि जो राष्ट्र अपनी भाषा और संस्कृति से दूर हो जाता है, वह वास्तविक प्रगति नहीं कर सकता। हमें अपनी भाषा और संस्कृति को अपनाने के साथ उन पर गर्व भी करना चाहिए।

कार्यक्रम की संयोजिका डॉ. निर्मला शर्मा ने संचालन करते हुए भारतेंदु हरिश्चंद्र की जयंती के अवसर पर हिंदी के विकास में उनके योगदान को याद किया और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

महाविद्यालय की निर्देशिका प्रो. कनिका शर्मा ने विद्यार्थियों से दैनिक जीवन में हिंदी का अधिक उपयोग करने और भाषा का सम्मान बढ़ाने की अपील की। विभागाध्यक्ष डॉ. सरस्वती जोशी ने स्वागत भाषण दिया।

कार्यक्रम में विद्यार्थियों और शिक्षकों ने हिंदी के बदलते स्वरूप और समाज में उसकी बढ़ती स्वीकार्यता पर वक्ताओं के विचार सुने। इस अवसर पर डॉ. मनीष रावल, डॉ. कंचन पानेरी, डॉ. अंजु जैन, डॉ. सबा खान, डॉ. ज्योति कंठालिया, डॉ. नीलू तिवारी, डॉ. हर्षित भटनागर, डॉ. किरण असनानी, डॉ. लक्ष्मण सिंह, मीनाक्षी पारीक और राजेश जैन मौजूद रहे।

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