कोटा–नागदा रेलखंड हादसा: क्या रेलवे इंजीनियरिंग कार्यों में सुरक्षा केवल कागजों तक सीमित रह गई है?

भोपाल । कोटा–नागदा रेलखंड के कपालपुरा–दरा सेक्शन में अंडरब्रिज विस्तार कार्य के दौरान मिट्टी धंसने से दो रेल इंजीनियर सुपरवाइजरों — वरिष्ठ अनुभाग अभियंता (SSE/P-Way) संजय झा और जूनियर इंजीनियर (Works) प्रभात सिंह — की मृत्यु ने रेलवे निर्माण कार्यों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
रेलवे कर्मचारी संगठनों का कहना है कि यह कोई अलग-थलग घटना नहीं, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में एक जैसी परिस्थितियों में हुई मौतों की लगातार श्रृंखला का हिस्सा है। यदि यह दावा सही है कि इस तरह की घटनाएं पहले भी कई बार हो चुकी हैं, तो यह केवल दुर्घटना नहीं, बल्कि “सिस्टमेटिक सेफ्टी फेल्योर” का संकेत माना जाएगा।
आखिर बार-बार क्यों हो रही हैं ऐसी दुर्घटनाएं?
रेलवे में अंडरब्रिज, लाइन विस्तार, ट्रैक डबलिंग और पुल निर्माण जैसे कार्य लगातार बढ़ रहे हैं। इन परियोजनाओं में अक्सर:
– गहरी खुदाई
– मिट्टी कटाव
– भारी मशीनरी
– सीमित कार्य समय
– लाइव ट्रैक के पास काम
जैसी उच्च जोखिम वाली परिस्थितियां होती हैं।
निर्माण सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यदि मिट्टी की स्थिरता, सपोर्ट सिस्टम और साइट मॉनिटरिंग पर्याप्त न हो, तो अचानक धंसाव की घटनाएं जानलेवा साबित हो सकती हैं।
विशेष रूप से मानसून पूर्व और गर्मी के मौसम में सूखी मिट्टी की संरचना कमजोर पड़ने का खतरा भी रहता है।
क्या कार्य-दबाव सुरक्षा पर भारी पड़ रहा है?
रेल कर्मचारी संगठनों ने आरोप लगाया है कि सुपरवाइजरों और कर्मचारियों पर अत्यधिक कार्य-दबाव बनाया जा रहा है तथा कार्य अवधि और सुरक्षा मानकों की स्पष्ट सीमाएं तय नहीं हैं।
रेलवे परियोजनाओं में अक्सर:
– समय सीमा पूरी करने का दबाव
– ब्लॉक अवधि की कमी
– स्टाफ की कमी
– लगातार शिफ्ट कार्य
– सीमित निगरानी
सुरक्षा जोखिम बढ़ा सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में “डेडलाइन कल्चर” कई बार जमीनी सुरक्षा प्रोटोकॉल को कमजोर कर देता है।
पुराने हादसों का जिक्र क्यों महत्वपूर्ण है?
संघ द्वारा 2014, 2021 और 2022 की समान प्रकृति की घटनाओं का उल्लेख केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं है। औद्योगिक सुरक्षा विश्लेषण में “रीपीटेड पैटर्न” को सबसे गंभीर संकेत माना जाता है।
यदि एक ही प्रकार की दुर्घटनाएं बार-बार होती हैं, तो इसका अर्थ हो सकता है:
– सुरक्षा ऑडिट प्रभावी नहीं हैं
– पुराने हादसों से संस्थागत सीख नहीं ली गई
– साइट रिस्क असेसमेंट कमजोर है
– फील्ड स्तर पर सुरक्षा अनुपालन सीमित है
विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी बड़ी संस्था में दुर्घटना के बाद “रूट कॉज एनालिसिस” और “करैक्टिव एक्शन सिस्टम” मजबूत होना जरूरी होता है।
रेलवे निर्माण कार्यों में कौन से सुरक्षा उपाय जरूरी माने जाते हैं?
सिविल और रेलवे इंजीनियरिंग विशेषज्ञों के अनुसार खुदाई और अंडरब्रिज कार्यों में सामान्यतः:
– मिट्टी की तकनीकी जांच
– शोरिंग और सपोर्ट सिस्टम
– ढलान स्थिरता विश्लेषण
– कार्यस्थल निगरानी
– आपातकालीन रेस्क्यू प्लान
– मौसम आधारित जोखिम मूल्यांकन
अनिवार्य माने जाते हैं।
यदि इनमें किसी स्तर पर कमी रह जाए, तो कुछ ही सेकंड में हादसा हो सकता है।
क्या रेलवे में सुरक्षा संस्कृति की समीक्षा जरूरी है?
पिछले कुछ वर्षों में रेलवे ने हाईस्पीड ट्रैक, स्टेशन पुनर्विकास, कॉरिडोर विस्तार और नई लाइन परियोजनाओं पर बड़े स्तर पर निवेश किया है। लेकिन विशेषज्ञ लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या “इंफ्रास्ट्रक्चर स्पीड” के साथ “सेफ्टी कल्चर” भी समान गति से मजबूत हो रहा है?
रेलवे कर्मचारियों के बीच यह धारणा बढ़ती दिखाई देती है कि:
– फील्ड स्टाफ पर दबाव बढ़ रहा है
– जिम्मेदारियां बढ़ी हैं लेकिन संसाधन सीमित हैं
– तकनीकी स्टाफ की कमी सुरक्षा को प्रभावित कर रही है
यदि यह स्थिति बनी रहती है, तो भविष्य में और गंभीर हादसों की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
हाई-लेवल जांच की मांग क्यों अहम?
संघ द्वारा उच्चस्तरीय जांच और जवाबदेही तय करने की मांग महत्वपूर्ण मानी जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी जांच केवल दोष तय करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि:
– कार्यप्रणाली की समीक्षा
– सुरक्षा मानकों का पुनर्मूल्यांकन
– फील्ड प्रशिक्षण
– साइट मॉनिटरिंग सिस्टम
– जोखिम आधारित कार्य अनुमति प्रणाली
जैसे पहलुओं को भी शामिल किया जाना चाहिए।
भविष्य के लिए सबसे बड़ा सवाल
यह हादसा केवल दो अधिकारियों की दुखद मृत्यु नहीं, बल्कि उस व्यापक प्रश्न को सामने लाता है कि भारत के तेजी से बढ़ते इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण मॉडल में श्रमिक और इंजीनियर सुरक्षा को कितना महत्व दिया जा रहा है।
यदि बार-बार होने वाली घटनाओं के बाद भी सुरक्षा प्रणाली में संरचनात्मक बदलाव नहीं होते, तो “दुर्घटना” धीरे-धीरे “संस्थागत विफलता” का रूप ले सकती है।
रेलवे देश की सबसे बड़ी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था है। ऐसे में निर्माण कार्यों के दौरान सुरक्षा को केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और मानव जीवन की प्राथमिकता के रूप में देखने की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।



