प्रधानमंत्री की आलोचना करने वाले कर्मचारी से जबरन माफ़ी, कार्यालय में घुसकर की मारपीट – लोकतंत्र पर गहराया सवाल

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रही है, जिसमें एक कर्मचारी को सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगने के लिए मजबूर किया गया, सिर्फ इसलिए क्योंकि उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक आलोचनात्मक टिप्पणी की थी। वीडियो में देखा जा सकता है कि कुछ कथित ‘मोदी समर्थक’ उस कर्मचारी के दफ्तर तक पहुँचते हैं, उसे धमकाते हैं, जलील करते हैं और अंत में मारपीट करते हैं।
क्या यह लोकतंत्र है?
यह घटना न सिर्फ चिंता का विषय है, बल्कि यह सवाल भी उठाती है कि क्या भारत में अब आलोचना की कोई जगह नहीं बची है? क्या अब सत्ता में बैठे लोगों के प्रति असहमति को ‘अपराध’ माना जाएगा? क्या यह अभिव्यक्ति की आज़ादी का गला घोंटने जैसा नहीं है?
पूर्व प्रधानमंत्रियों की भी होती रही है आलोचना
देश के इतिहास में यह कोई नई बात नहीं है कि प्रधानमंत्रियों की आलोचना हुई हो — पंडित नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक, हर प्रधानमंत्री पर जनता और विपक्ष ने सवाल उठाए हैं। परंतु कभी किसी आम नागरिक को इस तरह प्रताड़ित नहीं किया गया, जैसा अब देखा जा रहा है।
कानून का खुला उल्लंघन
इस तरह किसी के कार्यालय में घुसकर मारपीट करना, धमकी देना और जबरन माफ़ी मँगवाना भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं के तहत अपराध है। सवाल यह है कि क्या इन हमलावरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी? क्या कानून अब भी समान रूप से लागू होता है या कुछ के लिए विशेष छूट है?
समाज का मौन समर्थन या डर?
अफसोसजनक यह भी है कि इस तरह की घटनाओं पर समाज या तो चुप रहता है या डर के कारण प्रतिक्रिया नहीं देता। क्या यह डर लोकतंत्र की सबसे बड़ी हार नहीं है?





