भोपाल के विज्ञान केंद्र में बच्चों ने बनाए और उड़ाए मॉडल रॉकेट, ‘रॉकेट रेंजर्स’ कार्यशाला ने बढ़ाई स्पेस साइंस में रुचि

भोपाल । आंचलिक विज्ञान केन्द्र में आयोजित तीन दिवसीय “रॉकेट रेंजर्स – मॉडल रॉकेट्री कार्यशाला” केवल एक विज्ञान गतिविधि नहीं रही, बल्कि यह नई पीढ़ी को भारत के उभरते स्पेस इकोसिस्टम से जोड़ने की एक व्यावहारिक पहल बनकर सामने आई। 22 से 24 मई 2026 तक चली इस कार्यशाला में विद्यार्थियों ने किताबों से बाहर निकलकर रॉकेट विज्ञान को प्रयोगों और वास्तविक मॉडल लॉन्चिंग के जरिए समझा।
भारत में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की लगातार सफलताओं और निजी स्पेस स्टार्टअप्स के विस्तार के बीच बच्चों में एयरोस्पेस और स्पेस टेक्नोलॉजी के प्रति बढ़ती रुचि अब ऐसे कार्यक्रमों में साफ दिखाई देने लगी है।
क्यों महत्वपूर्ण है ऐसी मॉडल रॉकेट्री कार्यशाला?
विशेषज्ञों के अनुसार भारत की शिक्षा व्यवस्था में विज्ञान को अक्सर सैद्धांतिक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है, जबकि एयरोस्पेस जैसे क्षेत्रों में प्रयोग आधारित सीखना अधिक प्रभावी माना जाता है।
भोपाल की इस कार्यशाला में विद्यार्थियों ने:
न्यूटन के गति नियमों का वास्तविक उपयोग,
एयरोडायनामिक्स,
रॉकेट संतुलन और स्थिरता,
और लॉन्चिंग मैकेनिज्म
को प्रैक्टिकल रूप में समझा।
यही कारण है कि STEM (Science, Technology, Engineering and Mathematics) आधारित शिक्षा में मॉडल रॉकेट्री को दुनिया भर में महत्वपूर्ण गतिविधि माना जाता है।
बच्चों ने खुद डिजाइन किए मॉडल रॉकेट
कार्यशाला का सबसे आकर्षक हिस्सा वह रहा जब प्रतिभागियों ने स्वयं:
नोज़ कोन,
बॉडी ट्यूब,
फिन्स,
इंजन माउंट,
और पैराशूट रिकवरी सिस्टम
के साथ मॉडल रॉकेट तैयार किए।
इसके बाद इन रॉकेट्स का सफल प्रक्षेपण और सुरक्षित रिकवरी भी कराई गई। इस प्रक्रिया ने विद्यार्थियों को केवल विज्ञान नहीं सिखाया, बल्कि डिजाइन थिंकिंग, समस्या समाधान और टीमवर्क जैसी क्षमताओं से भी परिचित कराया।
भारत के स्पेस सेक्टर से जुड़ती नई पीढ़ी
पिछले कुछ वर्षों में भारत का स्पेस सेक्टर तेजी से बदल रहा है। अब केवल सरकारी संस्थान ही नहीं, बल्कि निजी कंपनियां और स्टार्टअप्स भी:
सैटेलाइट निर्माण,
लॉन्च टेक्नोलॉजी,
ड्रोन सिस्टम,
और स्पेस रिसर्च
में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
ऐसे में विशेषज्ञ मानते हैं कि स्कूल स्तर पर मॉडल रॉकेट्री जैसी गतिविधियां भविष्य के एयरोस्पेस इंजीनियर, वैज्ञानिक और इनोवेटर्स तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
पैराशूट रिकवरी सिस्टम ने बढ़ाया उत्साह
कार्यशाला में विद्यार्थियों को रॉकेट रिकवरी सिस्टम के बारे में भी विस्तार से बताया गया। पैराशूट आधारित रिकवरी तकनीक ने बच्चों को यह समझने का अवसर दिया कि वास्तविक अंतरिक्ष अभियानों में सुरक्षित लैंडिंग और रिकवरी कितनी महत्वपूर्ण होती है।
वैज्ञानिक शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि जब छात्र किसी वैज्ञानिक सिद्धांत को अपनी आंखों के सामने काम करते देखते हैं, तो उनकी जिज्ञासा और समझ दोनों कई गुना बढ़ जाती हैं।
विज्ञान केंद्रों की बदलती भूमिका
आंचलिक विज्ञान केन्द्र भोपाल जैसे संस्थान अब पारंपरिक प्रदर्शनी केंद्रों से आगे बढ़कर “इंटरैक्टिव साइंस लर्निंग स्पेस” के रूप में विकसित हो रहे हैं।
नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के बाद:
प्रयोग आधारित शिक्षा,
इनोवेशन,
और स्किल-ओरिएंटेड साइंस ट्रेनिंग
पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
भोपाल में आयोजित यह कार्यशाला इसी दिशा का उदाहरण मानी जा रही है।
भविष्य के लिए क्या संकेत?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसे कार्यक्रम नियमित रूप से स्कूलों और विज्ञान केंद्रों में आयोजित किए जाएं, तो:
मध्यप्रदेश जैसे राज्यों से भी स्पेस टेक्नोलॉजी में प्रतिभाएं उभर सकती हैं,
बच्चों में रिसर्च आधारित करियर के प्रति रुचि बढ़ सकती है,
और विज्ञान शिक्षा को अधिक व्यावहारिक बनाया जा सकता है।
कार्यशाला के समापन पर प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए, लेकिन इस आयोजन की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यह रही कि कई बच्चों ने पहली बार विज्ञान को केवल विषय नहीं, बल्कि संभावनाओं की दुनिया के रूप में महसूस किया।



