सांस लेने में गंभीर परेशानी के पीछे छिपी दुर्लभ बीमारी की पहचान, मणिपाल हॉस्पिटल ब्रॉडवे में किशोरी का सफल इलाज
न्यूमोनिया समझे जा रहे मामले में जांच से सामने आया मायस्थीनिया ग्रेविस, 21 दिन बाद स्वस्थ होकर लौटी मरीज
कोलकाता। झारखंड की एक किशोरी को अचानक सांस लेने में गंभीर परेशानी के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया। शुरुआती जांच में डॉक्टरों को फेफड़ों के संक्रमण (न्यूमोनिया) की आशंका हुई, लेकिन इलाज के बावजूद उसकी हालत बिगड़ती गई। बाद में विस्तृत जांच में सामने आया कि वह एक दुर्लभ तंत्रिका-मांसपेशी संबंधी बीमारी मायस्थीनिया ग्रेविस से पीड़ित थी, जिसके कारण उसे मायस्थेनिक क्राइसिस की गंभीर स्थिति का सामना करना पड़ा।
मणिपाल हॉस्पिटल ब्रॉडवे में विशेषज्ञों की संयुक्त टीम ने समय पर बीमारी की पहचान कर उसका सफल उपचार किया। उपचार के बाद किशोरी की मांसपेशियों की ताकत वापस लौटी और उसे वेंटिलेटर से सफलतापूर्वक हटाया गया। 21 दिनों के उपचार के बाद उसे स्वस्थ अवस्था में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
सांस की तकलीफ के बाद वेंटिलेटर की पड़ी जरूरत
मई महीने में किशोरी को गंभीर सांस संबंधी समस्या के चलते एक रेलवे अस्पताल से मणिपाल हॉस्पिटल ब्रॉडवे रेफर किया गया था। शुरुआती लक्षणों और सीटी स्कैन रिपोर्ट के आधार पर डॉक्टरों ने न्यूमोनिया की संभावना जताई और नसों के माध्यम से एंटीबायोटिक उपचार शुरू किया।
हालांकि कुछ ही समय में उसकी सांस लेने की समस्या बढ़ने लगी और श्वसन क्षमता प्रभावित होने के कारण उसे वेंटिलेटर सपोर्ट देना पड़ा।
जांच में सामने आया अलग कारण
आगे की जांच में डॉक्टरों ने पाया कि मरीज की गंभीर स्थिति और सीटी स्कैन में दिखाई दे रही फेफड़ों की स्थिति के बीच अंतर था। फेफड़ों में इतनी गंभीर क्षति नहीं थी, जितनी मरीज की हालत से अनुमान लगाया जा रहा था।
इसके बाद डॉक्टरों ने अन्य संभावित कारणों की जांच शुरू की। जांच में मरीज की मांसपेशियों में कमजोरी और चलने-फिरने की क्षमता में कमी पाई गई। इसके आधार पर तंत्रिका-मांसपेशी संबंधी बीमारी की संभावना जताई गई।
विस्तृत जांच के बाद पुष्टि हुई कि किशोरी मायस्थीनिया ग्रेविस के साथ मायस्थेनिक क्राइसिस से पीड़ित थी।
क्या है मायस्थीनिया ग्रेविस?
मायस्थीनिया ग्रेविस एक दुर्लभ ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली नसों और मांसपेशियों के बीच होने वाले संदेशों के आदान-प्रदान में बाधा उत्पन्न करती है। इससे मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं।
इस बीमारी के सामान्य लक्षणों में—
पलकों का झुकना
निगलने में परेशानी
हाथ-पैरों में कमजोरी
थकान और मांसपेशियों पर नियंत्रण में कमी
शामिल हो सकते हैं।
गंभीर स्थिति में सांस लेने वाली मांसपेशियां भी प्रभावित हो सकती हैं, जिसे मायस्थेनिक क्राइसिस कहा जाता है। यह स्थिति जीवन के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती है और मरीज को गहन चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता पड़ सकती है।
आईवीआईजी उपचार से हुई स्थिति में सुधार
बीमारी की पुष्टि होने के बाद मरीज को तुरंत इंट्रावीनस इम्यूनोग्लोबुलिन (आईवीआईजी) उपचार दिया गया। इसके साथ ही पल्मोनोलॉजी, न्यूरोलॉजी और क्रिटिकल केयर टीमों ने लगातार निगरानी रखी।
धीरे-धीरे मरीज की मांसपेशियों की ताकत में सुधार हुआ और उसे वेंटिलेटर से हटाया गया।
मणिपाल हॉस्पिटल्स कोलकाता के पल्मोनोलॉजी निदेशक देबराज यश ने बताया कि शुरुआत में मामला न्यूमोनिया जैसा लग रहा था, लेकिन जांच रिपोर्ट और मरीज की स्थिति में अंतर मिलने पर अन्य कारणों की तलाश की गई। समय पर बीमारी की पहचान और विभिन्न विभागों के समन्वय से उपचार सफल हो सका।
न्यूरोलॉजी विशेषज्ञ वैभव सेठ ने कहा कि मायस्थेनिक क्राइसिस में सांस लेने वाली मांसपेशियां कमजोर हो सकती हैं और कई बार मरीज को वेंटिलेटर की आवश्यकता पड़ती है। इस मामले में चुनौती यह थी कि मरीज में शुरुआती तौर पर सामान्य तंत्रिका संबंधी लक्षण स्पष्ट नहीं थे।
श्वसन विफलता में अन्य कारणों की जांच जरूरी
डॉक्टरों ने कहा कि हर श्वसन विफलता के मामले को केवल फेफड़ों की बीमारी से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। यदि मरीज के लक्षण और जांच रिपोर्ट पूरी तरह मेल नहीं खाते हैं, तो तंत्रिका संबंधी बीमारियों सहित अन्य संभावित कारणों की भी जांच आवश्यक होती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, मायस्थेनिक क्राइसिस जैसी दुर्लभ स्थितियों में समय पर सही निदान, उचित उपचार और विभिन्न विशेषज्ञों के बीच समन्वय मरीज की जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।