कांग्रेस नेता श्रीमती सोनिया गांधी लिखित किताब ‘बिलांगिंग: ए जर्नी आॅफ लव’ ( हिंदी में समझें तो ‘रिश्ते: एक सफर प्यार का’ ) को प्रकाशक पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया द्वारा भारत में छापने से इंकार और इस संदर्भ में बाकायदा बयान जारी करना आप में असामान्य घटना है। इस बयान ने कई सवालों और संदेहों को हवा दे दी है। इस पर राजनीतिक बवाल भी शुरू हो गया है। अमूमन किसी पुस्तक का छापना न छापना लेखक और प्रकाशक के बीच की बात होती है और प्रकाशित पुस्तक में क्या, कैसा और किसके बारे में लिखा गया है, इसकी जिम्मेदारी दोनो की होती है। लेकिन ऐसी कौन-सी बातें अथवा तथ्य हैं, जो प्रकाशक प्रकाशित नहीं करना चा हता था और जिसे लेखिका हर हाल में किताब में शामिल करना चाहती थी। कांग्रेस का आरोप है कि मोदी सरकार के दबाव में प्रकाशक ने ऐसा किया है, जबकि भाजपा ने इसका सिरे से खंडन किया है।
लेकिन यह पुस्तक विदेशों में छप रही है, ऐसे में जिन कथित ‘विवादित बातों या तथ्यों’ की वजह से पेंगुइन ने किताब छापने से इंकार किया, वह सार्वजनिक तो ही जाएंगी। यह बात को प्रकाशक को भी मालूम होगी, फिर भी उसने पुस्तक छापने से इंकार क्यों किया, इसके पीछे क्या राज है? यह या तो पुस्तक के पब्लिक डोमेन में आने के बाद पता चलेगा या फिर स्वयं सोनिया गांधी इस बारे में कुछ बोलें तो खुलासा होगा। हैरानी की बात है कि पेंगुइन द्वारा पुस्तक प्रकाशन से इंकार के बाद भी श्रीमती सोनिया गांधी ने अपनी तरफ से कुछ नहीं कहा। अलबत्ता प्रकाशक के अधिकृत बयान और कुछ मीडिया रिपोर्टस् से यही समझ आता है कि प्रकाशक ने लेखिका से पुस्तक में कुछ ‘संपादकीय बदलाव’ करने की बात कही थी, लेकिन सोनियाजी ने इंकार कर िदया। प्रकाशक ‘पेंगुइन इंडिया’ ने अपने बयान में कहा कि वह ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ़ लव’ की भारत में प्रकाशक नहीं है। किताब को प्रकाशित न करने का निर्णय इसलिए लिया गया, क्योंकि लेखिका ने संपादकीय बदलावों को ख़ारिज कर दिया था, यह परिस्थितियों को सटीक रूप से प्रदर्शित नहीं करता है। तथ्य की जांच करना और लेखक को ऐसे सुझाव देना जो किताब और लेखक दोनों के हित में हो, एक प्रकाशक के रूप में हमारा विशेषाधिकार और ज़िम्मेदारी दोनों है। पेंगुइन ने यह भी कहा कि वह लेखिका के साथ हुई गोपनीय चर्चाओं पर कोई टिप्पणी नहीं करेगी। कंपनी के इस बयान से संदेह और गहरा गया है। गौरतलब है कि इस बहुप्रतीक्षित किताब का विमोचन 10 नवंबर को प्रस्तावित है।
वैसे यह भी दिलचस्प है कि एक तरफ कांग्रेस नेता राहुल गांधी सवा दो हजार पहले रचित किताब ‘मनुस्मृति’ की आलोचना उसके कथित आपत्तिजनक अंशों के कारण कर रहे हैं तो दूसरी तरफ उनकी पार्टी एक किताब का प्रकाशन कथित रूप से रूकवाने के लिए मोदी सरकार पर निशाना साध रही है। पहले मामले में अभिव्यक्त विचारों को समाज में भेदभाव का कारण बताया जा रहा है तो दूसरे प्रकरण में पुस्तक में व्यक्त विचारों को ‘हटवाने’ को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन से जोड़ा जा रहा है।
वैसे अंग्रेजी शब्द ‘बिलांगिंग’ के हिंदी में मायने हैं संपत्ति अथवा रिश्ते। सोनियाजी निश्चित रूप से किसके बारे में बताना चाह रही हैं ? संभवत: यह रिश्तों के बारे में ही है। तो फिर रिश्तों को लेकर किताब में ऐसा क्या है, जिसकी वजह से प्रकाशक को पीछे हटना पड़ा? जहां तक श्रीमती सोनिया गांधी की बात है तो वो भारत के नंबर एक राजनीतिक परिवार की बहू रही हैं और अपने पति और प्रियतम राजीव गांधी के साथ विवाह कर भारत में ही बस गईं। वो सीधे राजनीति में बहुत बाद में आईं, लेकिन भारत में ‘इंदिरा युग के उदय से लेकर मोदी युग’ तक के छह दशकों की उथल पुथल भरी राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक यात्रा की साक्षी, आलोचक और कई बार निर्णायक भूमिका में भी रही हैं। बावजूद तमाम व्यक्तिगत आलोचनाअोंके सोनिया गांधी ने अपनी गरिमा को कायम रखा और प्रधानमंत्री की कुर्सी का भी स्वेच्छा से त्याग किया। जाहिर है कि एक ‘इनसाइडर’ और राजनीतिक धुरी होने के नाते उनके अपने अनुभव, आॅब्जर्वेशन, निजी सुख-दुख और टिप्पणियों का अलग महत्व है। विदेशी महिला होकर भी उन्होंने जिस गरिमामय तरीके से भारतीयता को स्वीकार किया, उसे इतिहास हमेशा याद रखेगा। ऐसे में सोनियाजी अपने समकालीन इतिहास पर क्या सोचती हैं, उसे किस निगाह से देखती हैं, क्या महसूस करती हैं, यह निश्चित ही अहम है।
इसी संदर्भ में पेंगुइन की अमेरिका में सहयोगी कंपनी इम्प्रिंट अल्फ्रेड ए. नोफ ने पुस्तक के संदर्भ में सोनिया गांधी के हवाले से जारी बयान में साफ किया था कि ‘मेरे परिवार के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है, लेकिन बहुत कम आख्यान उनकी प्रेरणाओं, उनके कार्यों और यहां तक कि उनकी मानवीय कमियों की सच्चाई तक पहुंच पाए हैं। छह दशकों से मैं जिन सामाजिक और राजनीतिक बदलावों की गवाह रही हूं, मेरी कहानी पाठकों को उनका एक अनूठा नजरिया भी पेश करेगी।”
उधर पेंगुइन के पुस्तक प्रकाशन से पीछे हटने पर कांग्रेस नेता कमलनाथ ने सोशल मीडिया पर लिखा कि हमारी आदरणीय नेता सोनिया गांधी की आत्मकथा के प्रकाशन से प्रकाशक का मना करना अत्यंत चिंता का विषय है। श्रीमती गांधी जैसा वरिष्ठ व्यक्ति क्या लिखेगा और क्या नहीं, क्या यह प्रकाशक तय करेगा? प्रकाशक स्वयं यह कह रहा है या उस पर किसी का दबाव है? कुछ पत्रकारों ने भी कहा कि प्रकाशन व्यवसाय पर सरकार का दबाव है और यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है। लोकसभा में कांग्रेस के उप नेता गौरव गोगोई ने सवाल किया कि पेंगुइन इंडिया ने पहले ‘एग्जाम वारियर्स’ और आरएसएस से जुड़ी किताबें प्रकाशित की हैं, लेकिन अब सोनिया गांधी की किताब को लेकर उसका अलग रुख क्यों है? इन आरोपों के जवाब में बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सीआर केशवन ने कहा कि कांग्रेस इस मामले में डर की कहानी बनाने की कोशिश कर रही है। भाजपा के ही प्रवक्ता अजय आलोक ने परोक्ष रूप से प्रकाशक की तरफदारी करते हुए कहा कि किसी किताब में शामिल तथ्यों और आंकड़ों की जांच करना पब्लिशिंग प्रक्रिया का हिस्सा है। पब्लिशर की ओर से फैक्ट चेक या बदलाव का सुझाव देना किसी राजनीतिक दबाव का सबूत नहीं माना जा सकता। हालांकि खुद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस विवाद पर केवल इतना कहा कि इस वक्त संविधान बचाना ज्यादा जरूरी है बजाए इसके कि किस किताब में से क्या हटाया जा रहा है।
किताब में निश्चित रूप से विवादास्पद बिंदु क्या हैं, इसके बारे में अनुमान ही लगाए जा रहे हैं। लेकिन जिनकी चर्चा है, वो भारत का चीन के साथ सीमा विवाद, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार और उसकी कार्यशैली तथा भाजपा की मातृसंस्था आरएसएस की भूमिका आदि हो सकते हैं। गौरतलब है कि श्रीमती सोनिया गांधी की इस बहुप्रतीक्षित आत्मकथा ‘बिलॉन्गिंग: अ जर्नी ऑफ लव’ के प्रकाशन का ऐलान 18 अगस्त 2026 को एक कार्यक्रम में किया गया था। इस संस्मरण को सोनियाजी के निजी और राजनीतिक जीवन का सबसे प्रामाणिक लेखा-जोखा बताया गया, जिसमें कई अनछुए पहलुओं को साझा किया गया है। हालांकि भारत में िकसी प्रकाशक द्वारा किसी पुस्तक को छापने से पीछे हटने की यह कोई पहली घटना नहीं है, लेकिन चूंकि इसका सीधा सम्बन्ध किसी व्यक्ति के निजी और सार्वजनिक जीवन तथा राजनीतिक सरोकारों से भी है, इसलिए इस पर बवाल ज्यादा मचा है। कुछ लोग इसे प्रकाशक की आड़ में लेखिका द्वारा कथित राजनीतिक दबाव के आगे न झुकने के रूप में देख रहे हैं। उनका मानना है कि यह सोनिया गांधी की निर्भीकता और दृढ़ता की ही एक और बानगी है। इसे लोकतंत्र में असहमति को दबाने की कोशिश के रूप में भी चित्रित किया जा रहा है। जो भी हो, यह संदेह तो बना ही रहेगा कि आखिर किस दबाव में प्रकाशक एक संभावित बेस्ट सेलर किताब को भारत में छापने से बच रहा है? क्या इस किताब से माध्यम से ऐसा कुछ उजागर होने वाला है, जो सत्ता प्रतिष्ठान को असहज कर सकता है, विचलित कर सकता है? हालांकि जब तक सारे तथ्य सामने नहीं आएं, तब तक इसे अघोषित सेंसरशिप भी नहीं कहा जा सकता।
एक बात और। आजकल फिल्म हो या कुछ और, उसे पब्लिक डोमेन में आने से पहले विवादित बनाने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, भले ही यह अंत में ‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया’ साबित हो, लेकिन तब तक धंधा चंगा हो जाता है। यह किसी भी कृति की व्यावसायिक सफलता का आजमाया हुआ फार्मूला है। खबर है कि बिलांगिंग’ का पहला आॅर्डर ही एक लाख प्रतियों का है। ऐसे में सियासी आरोप-प्रत्यारोप भी चलते रहेंगे और किताब का आॅर्डर भी बढ़ता रहेगा।
