
भोपाल ।।गर्मी बढ़ते ही बाजार में आइसक्रीम की मांग तेजी से बढ़ जाती है। इसी मौसम में खाद्य सुरक्षा विभाग भी सक्रिय हो जाता है, क्योंकि मांग बढ़ने के साथ मिलावट, गलत लेबलिंग और निम्न गुणवत्ता वाले उत्पादों का जोखिम भी बढ़ जाता है। भोपाल में खाद्य सुरक्षा विभाग द्वारा एक दर्जन से अधिक आइसक्रीम फैक्ट्री, डेयरी प्रतिष्ठानों और वितरण केंद्रों पर की गई कार्रवाई इसी व्यापक चिंता का हिस्सा मानी जा रही है।
महाकाल इंटरप्राइजेज, रिलायंस रिटेल और सनी इंटरप्राइजेज सहित कई प्रतिष्ठानों से विभिन्न ब्रांड्स के नमूने लेकर प्रयोगशाला जांच के लिए भेजे गए हैं। साथ ही निर्माण इकाइयों में साफ-सफाई, स्टॉक प्रबंधन और खाद्य मानकों की भी जांच की गई।
लेकिन इस कार्रवाई का सबसे महत्वपूर्ण पहलू “फ्रोजन डेजर्ट बनाम आइसक्रीम” की बहस है, जो पिछले कुछ वर्षों में देशभर में तेजी से उभरी है।
आखिर ‘फ्रोजन डेजर्ट’ और ‘आइसक्रीम’ में फर्क क्या है?
अधिकांश उपभोक्ता बाजार में बिकने वाले हर ठंडे मीठे उत्पाद को आइसक्रीम मान लेते हैं, जबकि खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुसार दोनों अलग श्रेणियां हैं।
आइसक्रीम
– मुख्यतः दूध और दुग्ध वसा (Milk Fat) से तैयार होती है
– इसमें प्राकृतिक डेयरी फैट का उपयोग किया जाता है
– उत्पादन लागत अपेक्षाकृत अधिक होती है
फ्रोजन डेजर्ट
– इसमें दूध वसा की जगह वनस्पति तेल या वेजिटेबल फैट का उपयोग हो सकता है
– कीमत कम रखने में मदद मिलती है
– कई बार उपभोक्ता इसे आइसक्रीम समझकर खरीद लेते हैं
यही कारण है कि खाद्य सुरक्षा विभाग पैकेजिंग पर लिखी तकनीकी जानकारी और लेबलिंग की विशेष जांच कर रहा है।
यह मुद्दा उपभोक्ताओं के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
विशेषज्ञों के अनुसार समस्या केवल स्वाद की नहीं, बल्कि पारदर्शिता की है। यदि किसी उत्पाद को स्पष्ट रूप से “फ्रोजन डेजर्ट” लिखा गया है और उपभोक्ता जानकारी के साथ उसे खरीदता है, तो यह वैध व्यापार है। लेकिन यदि ब्रांडिंग, पैकेजिंग या प्रचार इस तरह किया जाए कि उपभोक्ता उसे आइसक्रीम समझे, तो यह भ्रामक माना जा सकता है।
गर्मी के मौसम में:
– स्थानीय स्तर पर निम्न गुणवत्ता वाले उत्पादों की बिक्री बढ़ जाती है
– कोल्ड चेन टूटने का खतरा रहता है
– कृत्रिम फ्लेवर और रंगों का अत्यधिक उपयोग हो सकता है
– डेयरी उत्पादों में बैक्टीरियल संक्रमण का जोखिम बढ़ता है
इसीलिए खाद्य सुरक्षा विभाग नियमित सैंपलिंग अभियान चलाता है।
बड़ी ब्रांड्स पर कार्रवाई क्यों अहम मानी जा रही है?
भोपाल में की गई कार्रवाई में विभिन्न नामी ब्रांड्स के उत्पादों के नमूने लिए गए। विशेषज्ञ मानते हैं कि बड़ी कंपनियों पर भी समान निगरानी होना उपभोक्ता विश्वास के लिए जरूरी है।
इससे दो संदेश जाते हैं:
– खाद्य सुरक्षा जांच केवल छोटे व्यापारियों तक सीमित नहीं है
– ब्रांड प्रतिष्ठा नियामकीय जांच से ऊपर नहीं हो सकती
हालांकि यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि नमूने लेना दोष सिद्ध होना नहीं माना जाता। अंतिम निर्णय प्रयोगशाला रिपोर्ट के आधार पर होता है।
खाद्य सुरक्षा जांच में अब क्या बदल रहा है?
पहले अधिकांश कार्रवाई केवल मिलावट पकड़ने तक सीमित रहती थी, लेकिन अब जांच का दायरा व्यापक हो गया है। विभाग अब:
– लेबलिंग
– निर्माण तिथि
– सामग्री की संरचना
– स्टोरेज तापमान
– साफ-सफाई
– लाइसेंस अनुपालन
जैसे पहलुओं की भी विस्तृत जांच कर रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले वर्षों में खाद्य सुरक्षा निगरानी और अधिक डेटा-आधारित तथा तकनीकी हो सकती है।
डेयरी और कोल्ड चेन सबसे बड़ी चुनौती क्यों?
भारत में डेयरी आधारित उत्पादों की सुरक्षा काफी हद तक कोल्ड चेन पर निर्भर करती है। यदि उत्पादन से लेकर बिक्री तक तापमान नियंत्रण सही न रहे, तो उत्पाद जल्दी खराब हो सकते हैं।
विशेष रूप से गर्मियों में:
– बैक्टीरिया तेजी से बढ़ सकते हैं
– स्वाद और गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है
– फूड पॉइजनिंग का खतरा बढ़ सकता है
इसी वजह से निर्माण इकाइयों और स्टॉक पॉइंट्स की जांच को गंभीर माना जाता है।
उपभोक्ताओं को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
खाद्य विशेषज्ञ उपभोक्ताओं को सलाह देते हैं कि आइसक्रीम या फ्रोजन उत्पाद खरीदते समय:
– पैकेट पर “Ice Cream” या “Frozen Dessert” स्पष्ट पढ़ें
– निर्माण और एक्सपायरी तिथि जांचें
– पिघले और दोबारा जमाए गए उत्पाद से बचें
– लाइसेंस नंबर और ब्रांड जानकारी देखें
– अत्यधिक सस्ते उत्पादों के प्रति सतर्क रहें
आगे क्या असर दिख सकता है?
यदि प्रयोगशाला जांच में नमूनों में मानक उल्लंघन पाया जाता है, तो संबंधित फर्मों पर खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम के तहत कार्रवाई हो सकती है। इसमें जुर्माना, लाइसेंस निलंबन या कानूनी कार्रवाई तक शामिल हो सकती है।







