गेहूं खरीदी पर सियासत तेज: जीतू पटवारी ने उठाए स्लॉट, भुगतान और अव्यवस्था के सवाल

Bhopal । Jitu Patwari ने मध्यप्रदेश की सरकारी गेहूं खरीदी व्यवस्था को लेकर भाजपा सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि समर्थन मूल्य पर गेहूं बेचने की प्रक्रिया किसानों के लिए राहत की बजाय “परेशानी, तकनीकी बाधाओं और भ्रष्टाचार” का कारण बनती जा रही है।

भोपाल में जारी बयान में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने ई-उपार्जन पोर्टल, स्लॉट बुकिंग, भुगतान में देरी, बारदानों की कमी और खरीदी केंद्रों की अव्यवस्था को किसानों की सबसे बड़ी समस्याएं बताया। उनका कहना है कि सरकार प्रचार में व्यस्त है, जबकि जमीनी स्तर पर किसान लंबी प्रतीक्षा, तकनीकी गड़बड़ियों और आर्थिक दबाव से जूझ रहे हैं।

MSP व्यवस्था में तकनीक नई, समस्याएं पुरानी

मध्यप्रदेश देश के प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में शामिल है और यहां हर वर्ष बड़ी मात्रा में सरकारी समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीदी की जाती है। पिछले कुछ वर्षों में खरीदी प्रक्रिया को डिजिटल बनाने के लिए ई-उपार्जन प्रणाली लागू की गई, जिसका उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना और बिचौलियों की भूमिका कम करना था।

लेकिन किसानों की शिकायतें बताती हैं कि तकनीक आधारित व्यवस्था अब खुद एक नई चुनौती बनती जा रही है।

Jitu Patwari ने आरोप लगाया कि—

स्लॉट बुकिंग समय पर नहीं हो रही

पोर्टल बार-बार डाउन हो रहा है

और कई किसानों का रिकॉर्ड सैटेलाइट सर्वे तथा एआई सत्यापन में गलत दिख रहा है।


विशेषज्ञों के अनुसार कृषि क्षेत्र में डिजिटल सिस्टम लागू करना जरूरी है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट, डेटा अपडेट और तकनीकी सहायता की कमी कई बार किसानों को मुश्किल में डाल देती है।

खरीदी केंद्रों पर लंबा इंतजार

प्रदेश के कई खरीदी केंद्रों से ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की लंबी कतारों और कई दिनों तक इंतजार की तस्वीरें सामने आती रही हैं। किसान संगठनों का कहना है कि पर्याप्त तौल मशीनें, श्रमिक और स्टोरेज व्यवस्था नहीं होने के कारण प्रक्रिया धीमी हो जाती है।

गर्म मौसम में खुले में खड़े किसानों के लिए यह स्थिति आर्थिक और शारीरिक दोनों स्तर पर कठिन मानी जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि खरीदी व्यवस्था में “समय प्रबंधन” सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि फसल कटाई के तुरंत बाद लाखों किसान एक साथ उपार्जन केंद्रों पर पहुंचते हैं।

बारदानों की कमी और भुगतान में देरी

कांग्रेस ने बारदानों की कमी और भुगतान में देरी को भी बड़ा मुद्दा बनाया है। किसानों का आरोप है कि कई जगहों पर बोरे उपलब्ध नहीं होने के कारण खरीदी प्रभावित होती है और उन्हें निजी स्तर पर व्यवस्था करने का दबाव झेलना पड़ता है।

इसके अलावा MSP भुगतान में देरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डालती है। कृषि अर्थशास्त्रियों के अनुसार किसान फसल बेचने के तुरंत बाद अगली बुवाई, कर्ज भुगतान और घरेलू खर्चों के लिए उसी राशि पर निर्भर रहते हैं। भुगतान अटकने पर उनका आर्थिक चक्र प्रभावित होता है।

AI और सैटेलाइट सत्यापन पर सवाल

इस बार खरीदी प्रक्रिया में सैटेलाइट आधारित सर्वे और एआई सत्यापन का इस्तेमाल भी चर्चा में है। सरकार का उद्देश्य फर्जी पंजीयन और अनियमितताओं को रोकना है, लेकिन विपक्ष का आरोप है कि तकनीकी त्रुटियों के कारण वास्तविक किसानों का रिकॉर्ड प्रभावित हो रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि में AI आधारित सत्यापन भविष्य की आवश्यकता हो सकता है, लेकिन जमीनी डेटा की सटीकता और स्थानीय सत्यापन तंत्र मजबूत किए बिना केवल तकनीक पर निर्भरता विवाद पैदा कर सकती है।

बिचौलियों की वापसी का आरोप

Jitu Patwari ने खरीदी केंद्रों पर बिचौलियों और “पहले तौल” के नाम पर कथित लेनदेन के आरोप भी लगाए। कृषि मंडियों और सरकारी खरीदी व्यवस्था में यह मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक बहस का हिस्सा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जहां भी सरकारी प्रक्रिया धीमी होती है, वहां अनौपचारिक नेटवर्क सक्रिय हो जाते हैं और छोटे किसान मजबूरी में कम कीमत पर फसल बेचने लगते हैं।

चुनावी राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकता है गेहूं उपार्जन

मध्यप्रदेश की राजनीति में किसान और समर्थन मूल्य हमेशा निर्णायक मुद्दे रहे हैं। गेहूं खरीदी में अव्यवस्था के आरोप ऐसे समय सामने आए हैं जब ग्रामीण अर्थव्यवस्था पहले से महंगाई, मौसम जोखिम और बढ़ती लागत के दबाव में है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि किसानों की शिकायतें लंबे समय तक बनी रहती हैं, तो विपक्ष इसे बड़े जनआंदोलन के रूप में उठाने की कोशिश कर सकता है। वहीं सरकार के सामने चुनौती यह होगी कि तकनीक आधारित खरीदी व्यवस्था को जमीनी स्तर पर प्रभावी और भरोसेमंद साबित किया जाए।

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