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भोपाल में ‘सबसे दूर सबसे पहले’ अभियान: अब प्रशासन की प्राथमिकता बने दूरस्थ जनजातीय परिवार

Bhopal में प्रशासन अब सरकारी योजनाओं की “घोषणा आधारित व्यवस्था” से आगे बढ़कर “मैदानी पहुंच आधारित मॉडल” पर जोर देता दिखाई दे रहा है। इसी दिशा में भानपुर केकड़िया ग्राम में जनजातीय समुदायों के लिए विशेष हितग्राही शिविर आयोजित करने की तैयारी की गई है।

कलेक्टर Priyank Mishra ने “जनभागीदारी – सबसे दूर सबसे पहले” अभियान के तहत 18 से 25 मई तक शिविर लगाने, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने और योजनाओं की “पूर्ण संतृप्ति” सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।

यह पहल केवल प्रशासनिक शिविर नहीं मानी जा रही, बल्कि उन समुदायों तक शासन की सीधी पहुंच स्थापित करने की कोशिश है जो अक्सर सरकारी योजनाओं के अंतिम लाभार्थी बनने से पहले ही प्रक्रिया से बाहर हो जाते हैं।

“सबसे दूर सबसे पहले” मॉडल क्यों अहम?

भारत में जनजातीय और दूरस्थ आबादी तक सरकारी योजनाओं की पहुंच लंबे समय से चुनौती रही है। कई बार योजनाएं कागजों में सक्रिय रहती हैं, लेकिन लाभार्थियों तक दस्तावेज, पहचान, बैंकिंग, स्वास्थ्य या डिजिटल प्रक्रिया की बाधाओं के कारण पूरी तरह नहीं पहुंच पातीं।

इसी कारण केंद्र और राज्य सरकारें अब “लास्ट माइल डिलीवरी” यानी अंतिम व्यक्ति तक सेवा पहुंचाने पर विशेष फोकस कर रही हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार “सबसे दूर सबसे पहले” जैसी अवधारणा प्रशासनिक सोच में बदलाव का संकेत है, जहां लक्ष्य केवल योजना शुरू करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि सबसे कमजोर वर्ग वास्तव में उसका लाभ उठा पाए।

स्वास्थ्य और योजनाओं को साथ जोड़ने की रणनीति

भानपुर केकड़िया में प्रस्तावित शिविरों में केवल दस्तावेजी काम नहीं होगा, बल्कि स्वास्थ्य विस्तार सेवाओं को भी शामिल किया जाएगा।

यह रणनीति इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि दूरस्थ और जनजातीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच अक्सर सीमित रहती है। कुपोषण, टीकाकरण, मातृ स्वास्थ्य और प्राथमिक उपचार जैसी समस्याएं अब भी कई समुदायों में चुनौती बनी हुई हैं।

यदि प्रशासन स्वास्थ्य, पहचान, सामाजिक सुरक्षा और वित्तीय योजनाओं को एकीकृत शिविर मॉडल में जोड़ता है, तो लाभार्थियों को बार-बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।

फॉर्मर आईडी और डिजिटल प्रशासन पर जोर

बैठक में उर्वरक वितरण के लिए ई-विकास पोर्टल के माध्यम से किसान फॉर्मर आईडी तैयार करने की प्रक्रिया की भी समीक्षा की गई।

विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि और कल्याणकारी योजनाओं में डिजिटल पहचान अब केंद्रीय भूमिका निभा रही है। इससे सब्सिडी, खाद वितरण और लाभ हस्तांतरण में पारदर्शिता बढ़ती है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल साक्षरता और तकनीकी सहायता की कमी बड़ी चुनौती बनी रहती है।

इसी कारण कलेक्टर ने शिविरों के भौतिक सत्यापन के निर्देश दिए, ताकि केवल पोर्टल आधारित प्रगति के बजाय जमीनी स्थिति भी जांची जा सके।

मुख्यमंत्री हेल्पलाइन और जवाबदेही का दबाव

बैठक में लंबित शिकायतों के निराकरण पर सख्त रुख अपनाते हुए अधिकारियों को चेतावनी दी गई कि लापरवाही पर कारण बताओ नोटिस जारी किए जाएंगे।

यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल शिकायत प्रणालियां बढ़ी हैं, लेकिन कई मामलों में शिकायतें “औपचारिक निस्तारण” तक सीमित रह जाती हैं। अब प्रशासन पर गुणवत्तापूर्ण समाधान देने का दबाव भी बढ़ रहा है।

ई-ऑफिस सिस्टम: फाइलों से डिजिटल प्रशासन की ओर

कलेक्टर ने सभी विभागों को ई-ऑफिस प्रणाली के माध्यम से कार्य संचालन के निर्देश दिए। यह बदलाव प्रशासनिक पारदर्शिता और फाइल ट्रैकिंग के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

डिजिटल शासन विशेषज्ञों के अनुसार ई-ऑफिस मॉडल से—

फाइल मूवमेंट तेज होता है

जवाबदेही बढ़ती है

रिकॉर्ड सुरक्षित रहते हैं

निर्णय प्रक्रिया ट्रैक की जा सकती है


हालांकि छोटे कार्यालयों और ग्रामीण स्तर पर डिजिटल अवसंरचना और प्रशिक्षण अब भी चुनौती बने हुए हैं।

विस्फोटक और पटाखा प्रतिष्ठानों की निगरानी क्यों जरूरी?

बैठक में विस्फोटक और पटाखा दुकानों के नियमित निरीक्षण के निर्देश भी दिए गए। विशेषज्ञों के अनुसार तेजी से बढ़ते शहरी क्षेत्रों में अनधिकृत विस्फोटक भंडारण सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।

देश के कई हिस्सों में पटाखा गोदामों में आग और विस्फोट की घटनाओं के बाद प्रशासन अब नियमित निरीक्षण और लाइसेंस सत्यापन पर अधिक जोर दे रहा है।

क्या यह मॉडल प्रशासनिक बदलाव का संकेत है?

भोपाल में हुई यह समीक्षा बैठक केवल विभागीय औपचारिकता नहीं दिखती। इसमें ग्रामीण पहुंच, डिजिटल प्रशासन, जनजातीय विकास, स्वास्थ्य सेवाएं, शिकायत निवारण और सुरक्षा निगरानी जैसे कई आयाम एक साथ दिखाई देते हैं।

यदि “जनभागीदारी – सबसे दूर सबसे पहले” अभियान केवल शिविर आयोजन तक सीमित न रहकर निरंतर फील्ड मॉनिटरिंग और वास्तविक लाभार्थी संतृप्ति तक पहुंचता है, तो यह प्रशासनिक कार्यप्रणाली में महत्वपूर्ण बदलाव का उदाहरण बन सकता है।

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