एम्स भोपाल में योग और आधुनिक चिकित्सा का संगम: इंटीग्रेटिव मेडिसिन पर बढ़ता भरोसा, मानसिक स्वास्थ्य से मातृत्व देखभाल तक नई संभावनाएं

AIIMS Bhopal में आयोजित “इंटीग्रेटिव मेडिसिन” कार्यशाला ने यह संकेत दिया है कि भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था अब केवल रोग उपचार तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि समग्र स्वास्थ्य मॉडल की ओर तेजी से बढ़ रही है। “इंटीग्रेटिव मेडिसिन: ब्रिजिंग साइंस एंड होलिस्टिक हीलिंग फॉर कॉम्प्रिहेन्सिव केयर” विषय पर आयोजित इस कार्यशाला में योग, मानसिक स्वास्थ्य, शोध आधारित चिकित्सा और आधुनिक मेडिकल साइंस को एक साझा मंच पर लाने का प्रयास किया गया।
कार्यक्रम का आयोजन एम्स भोपाल के Collaborative Center for Mind-Body Interventions Through Yoga (CCMBIY-CCRYN) द्वारा किया गया, जिसमें देशभर के विद्यार्थियों, शोधार्थियों, विशेषज्ञों और शिक्षकों ने भाग लिया। यह आयोजन केवल एक अकादमिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत में “इंटीग्रेटिव हेल्थकेयर” मॉडल की बदलती दिशा का संकेत भी माना जा रहा है।
आखिर क्या है इंटीग्रेटिव मेडिसिन?
इंटीग्रेटिव मेडिसिन का अर्थ केवल योग या वैकल्पिक चिकित्सा को बढ़ावा देना नहीं है। इसका उद्देश्य आधुनिक वैज्ञानिक चिकित्सा और पारंपरिक स्वास्थ्य पद्धतियों—जैसे योग, माइंड-बॉडी थेरेपी और जीवनशैली प्रबंधन—को प्रमाण आधारित तरीके से जोड़ना है।
दुनियाभर में विशेष रूप से कोविड-19 महामारी के बाद मानसिक तनाव, जीवनशैली रोगों और दीर्घकालिक बीमारियों के बढ़ते मामलों ने इस मॉडल की प्रासंगिकता बढ़ाई है।
विशेषज्ञों के अनुसार:
योग तनाव और चिंता कम करने में मदद कर सकता है
नियंत्रित श्वसन तकनीकें मानसिक संतुलन सुधारती हैं
माइंड-बॉडी इंटरवेंशन क्रॉनिक पेन मैनेजमेंट में सहायक हो सकते हैं
गर्भावस्था और वृद्धावस्था देखभाल में योग आधारित सपोर्ट लाभकारी माना जा रहा है
हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि योग आधुनिक चिकित्सा का विकल्प नहीं बल्कि पूरक (Complementary) प्रणाली के रूप में अधिक प्रभावी माना जाता है।
युवाओं और शोधकर्ताओं पर क्यों रहा फोकस?
कार्यशाला में लगभग 150 से 200 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया, जिनमें स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी स्तर के विद्यार्थी शामिल रहे। आयोजन का बड़ा उद्देश्य युवाओं को शोध आधारित इंटीग्रेटिव हेल्थ मॉडल से जोड़ना था।
इस दौरान:
योगासन प्रतियोगिता
पेंटिंग प्रतियोगिता
रिसर्च पोस्टर प्रस्तुति
आयोजित की गईं। रिसर्च पोस्टर प्रतियोगिता विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही क्योंकि इसमें योग और समग्र चिकित्सा से जुड़े शोध कार्यों को प्रदर्शित किया गया।
स्वास्थ्य शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इंटीग्रेटिव मेडिसिन को वैज्ञानिक आधार पर विकसित करना है, तो मेडिकल संस्थानों में शोध संस्कृति मजबूत करना अनिवार्य होगा।
मानसिक स्वास्थ्य पर योग की भूमिका पर जोर
तकनीकी सत्रों में विशेषज्ञों ने योग और मानसिक स्वास्थ्य के संबंध पर विशेष चर्चा की। Bhavit Bansal ने बताया कि नियमित योग अभ्यास मस्तिष्क की कार्यक्षमता और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में सहायक हो सकता है।
आज भारत में मानसिक स्वास्थ्य एक तेजी से उभरती चुनौती है। युवाओं में तनाव, चिंता, नींद की समस्या और डिजिटल थकान बढ़ रही है। ऐसे में मेडिकल विशेषज्ञ अब “प्रिवेंटिव हेल्थ” और “माइंड-बॉडी बैलेंस” पर अधिक ध्यान देने लगे हैं।
पीठ दर्द, गर्भावस्था और जीवनशैली रोगों में संभावनाएं
कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने योग के चिकित्सीय उपयोगों पर भी चर्चा की। Rakesh Sethi ने बताया कि योग पीठ दर्द जैसी समस्याओं में सहायक हो सकता है, जबकि Babita Raghuvanshi ने गर्भावस्था के दौरान सुरक्षित योग अभ्यास और उसके लाभों पर विस्तार से जानकारी दी।
भारत में बढ़ते जीवनशैली रोग—जैसे:
हाई ब्लड प्रेशर
मधुमेह
मोटापा
मस्कुलोस्केलेटल दर्द
तनाव जनित विकार
ने स्वास्थ्य प्रणाली पर अतिरिक्त दबाव बढ़ाया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि योग आधारित जीवनशैली हस्तक्षेप वैज्ञानिक प्रोटोकॉल के साथ लागू किए जाएं, तो इससे उपचार लागत और दीर्घकालिक स्वास्थ्य बोझ कम करने में मदद मिल सकती है।
नीति स्तर पर भी बढ़ रहा समर्थन
कार्यक्रम में Uday Pratap Singh की उपस्थिति यह संकेत भी देती है कि योग और समग्र स्वास्थ्य मॉडल को अब केवल वैकल्पिक चिकित्सा नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।
भारत सरकार और Ministry of AYUSH पिछले कुछ वर्षों से योग और पारंपरिक चिकित्सा के वैज्ञानिक एकीकरण पर जोर दे रहे हैं। हालांकि चिकित्सा समुदाय का एक वर्ग अब भी इस बात पर बल देता है कि हर दावे को कठोर वैज्ञानिक परीक्षण और क्लिनिकल रिसर्च के आधार पर ही स्वीकार किया जाना चाहिए।
एम्स भोपाल की बढ़ती भूमिका
Ashok Kumar Mahapatra और Madhabananda Kar ने अपने संदेशों में योग और मानसिक संतुलन आधारित स्वास्थ्य मॉडल को भविष्य की आवश्यकता बताया।
एम्स भोपाल पिछले कुछ समय से केवल उपचार केंद्र के रूप में नहीं, बल्कि रिसर्च, जनस्वास्थ्य जागरूकता और समग्र स्वास्थ्य मॉडल विकसित करने वाले संस्थान के रूप में भी अपनी पहचान मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था कैसी हो सकती है?
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में स्वास्थ्य सेवाओं का मॉडल “इलनेस बेस्ड” से “वेलनेस बेस्ड” होता जाएगा। यानी केवल बीमारी का इलाज नहीं, बल्कि:
मानसिक संतुलन
जीवनशैली सुधार
तनाव प्रबंधन
निवारक स्वास्थ्य देखभाल
समग्र पुनर्वास
पर अधिक फोकस होगा।
एम्स भोपाल की यह कार्यशाला इसी बदलते स्वास्थ्य दृष्टिकोण की एक झलक मानी जा रही है, जहां योग और आधुनिक चिकित्सा प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि सहयोगी रूप में सामने आ रहे हैं।



