फैटी लिवर की शुरुआती पहचान में बड़ा संकेत: एम्स भोपाल के शोध ने खोले ‘ब्लड-बेस्ड डायग्नोसिस’ के नए रास्ते

भोपाल ।।भारत में तेजी से बढ़ रही मेटाबोलिक बीमारियों के बीच एम्स भोपाल से सामने आया एक नया शोध भविष्य की लिवर चिकित्सा में महत्वपूर्ण बदलाव का आधार बन सकता है। संस्थान की एमडी बायोकैमिस्ट्री छात्रा डॉ. दीपा रोशनी द्वारा प्रकाशित अध्ययन में “एड्रोपिन” और “आइरिसिन” नामक जैविक संकेतकों (Biomarkers) को मेटाबोलिक-एसोसिएटेड फैटी लिवर डिजीज (MAFLD) की पहचान और निगरानी के लिए संभावित गैर-आक्रामक विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
यह शोध केवल एक अकादमिक उपलब्धि नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे उस दिशा में शुरुआती कदम के रूप में देखा जा रहा है जहां भविष्य में फैटी लिवर जैसी गंभीर बीमारी की पहचान साधारण रक्त परीक्षण के जरिए संभव हो सकती है।
क्यों चिंता का विषय बन चुका है MAFLD?
जिस बीमारी को पहले आमतौर पर “फैटी लिवर” कहा जाता था, उसे अब चिकित्सा जगत में अधिक व्यापक रूप से “मेटाबोलिक-एसोसिएटेड फैटी लिवर डिजीज (MAFLD)” कहा जा रहा है। यह बदलाव केवल नाम का नहीं, बल्कि बीमारी की समझ में आए बदलाव का संकेत है।
विशेषज्ञों के अनुसार यह रोग अब केवल शराब सेवन से जुड़ी समस्या नहीं माना जाता, बल्कि मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज, इंसुलिन रेजिस्टेंस, उच्च कोलेस्ट्रॉल और निष्क्रिय जीवनशैली से गहराई से जुड़ा हुआ है। भारत जैसे देशों में, जहां शहरीकरण और प्रोसेस्ड फूड की खपत तेजी से बढ़ रही है, वहां MAFLD सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले सकता है।
चिंता की बात यह है कि शुरुआती चरण में इस बीमारी के स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाई देते। कई मरीज तब सामने आते हैं जब लिवर में सूजन, फाइब्रोसिस या स्थायी क्षति शुरू हो चुकी होती है।
मौजूदा जांच प्रणाली की सबसे बड़ी समस्या
फैटी लिवर की पुष्टि के लिए अभी भी कई मामलों में लिवर बायोप्सी को निर्णायक जांच माना जाता है। लेकिन यह एक आक्रामक प्रक्रिया है, जिसमें सुई के जरिए लिवर से ऊतक निकालकर परीक्षण किया जाता है। इससे संक्रमण, दर्द और अन्य जटिलताओं का जोखिम रहता है।
दूसरी ओर उन्नत इमेजिंग तकनीकें जैसे FibroScan या MRI आधारित परीक्षण महंगे हैं और छोटे शहरों या ग्रामीण क्षेत्रों में आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में चिकित्सा जगत लंबे समय से ऐसे बायोमार्कर की तलाश में है जो कम लागत, आसान और भरोसेमंद जांच का विकल्प बन सकें।
यहीं पर एड्रोपिन और आइरिसिन जैसे बायोमार्कर महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
एड्रोपिन और आइरिसिन आखिर हैं क्या?
शोध के अनुसार “एड्रोपिन” शरीर में ऊर्जा संतुलन, ग्लूकोज नियंत्रण, वसा चयापचय और सूजन प्रक्रिया से जुड़ा प्रोटीन है। इसके स्तर में बदलाव का संबंध मोटापा, इंसुलिन रेजिस्टेंस और हृदय रोग जोखिम से देखा गया है।
वहीं “आइरिसिन” को एक्सरसाइज-प्रेरित मायोकाइन माना जाता है, जो शरीर में ऊर्जा व्यय और मेटाबोलिक सुधार से जुड़ा है। सरल शब्दों में कहें तो यह शरीर की शारीरिक गतिविधियों और मेटाबोलिक स्वास्थ्य के बीच संबंध को दर्शाने वाला संकेतक माना जा रहा है।
क्योंकि MAFLD का सबसे प्रभावी उपचार अभी भी जीवनशैली सुधार—जैसे वजन नियंत्रण, व्यायाम और बेहतर आहार—माना जाता है, इसलिए आइरिसिन जैसे बायोमार्कर भविष्य में उपचार की प्रभावशीलता मापने में भी मदद कर सकते हैं।
शोध की सबसे बड़ी खासियत क्या है?
यह अध्ययन केवल बायोमार्कर की पहचान तक सीमित नहीं है। इसमें शोध को “क्लिनिकल एप्लिकेशन” और “बौद्धिक संपदा” यानी पेटेंट संभावनाओं से भी जोड़ा गया है।
यानी भविष्य में यदि इन बायोमार्करों पर आधारित कोई डायग्नोस्टिक किट या जांच तकनीक विकसित होती है, तो वह केवल शोध पत्र तक सीमित न रहकर चिकित्सा उद्योग और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली का हिस्सा बन सकती है।
चिकित्सा विशेषज्ञ इसे “प्रिसिजन हेपेटोलॉजी” की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मान रहे हैं—जहां हर मरीज के जैविक प्रोफाइल के आधार पर बीमारी का आकलन और उपचार तय किया जाएगा।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह रिसर्च?
भारत को दुनिया की “डायबिटीज कैपिटल” कहा जाता रहा है और अब फैटी लिवर के मामलों में भी तेजी से वृद्धि देखी जा रही है। कई शोधों में यह सामने आया है कि शहरी भारतीय आबादी का बड़ा हिस्सा किसी न किसी स्तर पर फैटी लिवर से प्रभावित हो सकता है।
यदि कम लागत वाले और गैर-आक्रामक बायोमार्कर आधारित परीक्षण विकसित होते हैं, तो इससे—
बीमारी की शुरुआती पहचान आसान होगी
ग्रामीण और छोटे शहरों तक स्क्रीनिंग पहुंच सकेगी
लिवर बायोप्सी पर निर्भरता कम हो सकती है
हाई-रिस्क मरीजों की नियमित निगरानी संभव होगी
व्यक्तिगत चिकित्सा (Personalized Medicine) को बढ़ावा मिलेगा
आगे की राह क्या होगी?
हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि किसी बायोमार्कर को नियमित क्लिनिकल उपयोग में लाने से पहले बड़े स्तर पर क्लिनिकल वैलिडेशन आवश्यक होता है। अलग-अलग आयु समूहों, जातीय पृष्ठभूमि और रोग स्थितियों में इसके परिणामों की पुष्टि करनी होगी।
फिर भी एम्स भोपाल का यह शोध इस दिशा में महत्वपूर्ण संकेत देता है कि भारत में चिकित्सा अनुसंधान अब केवल रोग की व्याख्या तक सीमित नहीं, बल्कि भविष्य की डायग्नोस्टिक टेक्नोलॉजी और हेल्थ-इनोवेशन इकोसिस्टम की ओर भी बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले वर्षों में यदि AI आधारित स्वास्थ्य विश्लेषण और बायोमार्कर विज्ञान एक साथ आगे बढ़ते हैं, तो फैटी लिवर जैसी “साइलेंट डिजीज” की पहचान बहुत पहले संभव हो सकेगी—और यही समय पर उपचार की सबसे बड़ी कुंजी होगी।



