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मध्यप्रदेश में उजागर हुआ एम्बुलेंस घोटाला: 2000 एम्बुलेंसों पर 900 करोड़ का खर्च, हर एम्बुलेंस पर 45 लाख किराया!

भोपाल। मध्यप्रदेश सरकार के स्वास्थ्य विभाग में एक और बड़ा घोटाला उजागर हुआ है, जिसने प्रदेश की राजनीतिक फिजाओं में हलचल मचा दी है। यह नया मामला एम्बुलेंस सेवा से जुड़ा है, जहां सरकार द्वारा 2000 एम्बुलेंस के लिए करीब 900 करोड़ रुपये का किराया भुगतान किया गया। इस हिसाब से एक-एक एम्बुलेंस पर औसतन 45 लाख रुपये किराया बैठता है, जो सामान्य दरों से कई गुना अधिक बताया जा रहा है।

स्वास्थ्य व्यवस्था में घोटालों की भरमार
मध्यप्रदेश पहले से ही नकली डॉक्टरों, नकली दवाइयों और स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार को लेकर सवालों के घेरे में रहा है। अब एम्बुलेंस किराया घोटाले ने सरकार की नीयत और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

900 करोड़ के भुगतान पर विपक्ष हमलावर
विपक्षी दलों ने इस पूरे प्रकरण को लेकर सरकार पर सीधा हमला बोला है। उनका कहना है कि जब प्रदेश की जनता को अस्पतालों में बुनियादी इलाज तक नहीं मिल पा रहा, तब सरकार का 900 करोड़ रुपये किराए पर लुटाना, जनता के साथ धोखा है। विपक्ष ने इसे नीति नहीं, नीयत की कमी बताया है।

किराया या कमीशन? उठे सवाल
आंकड़ों के अनुसार, राज्य सरकार ने जिन एम्बुलेंसों का अनुबंध किया है, वे सरकारी संपत्ति न होकर निजी कंपनियों से किराए पर ली गई हैं। सवाल ये है कि क्या ये राशि वास्तव में सेवा के अनुरूप है, या फिर इसमें कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार का गहरा खेल है?

RTI से हुआ खुलासा
बताया जा रहा है कि इस घोटाले की जानकारी RTI (सूचना के अधिकार) के जरिए सामने आई, जिसमें यह खुलासा हुआ कि एम्बुलेंस सेवा के नाम पर भारी-भरकम रकम खर्च की जा रही है, जबकि कई जिलों में एम्बुलेंस समय पर नहीं पहुंचती, और मरीजों की जान तक चली जाती है।

जनता का पैसा, जवाबदेही किसकी?
इस घोटाले को लेकर जनता में भारी आक्रोश है। सामाजिक कार्यकर्ता और जन प्रतिनिधि अब इस बात की मांग कर रहे हैं कि घोटाले की जांच उच्चस्तरीय समिति से कराई जाए और दोषियों को कठोर दंड दिया जाए।

मध्यप्रदेश सरकार की चुप्पी सवालों के घेरे में
अब तक राज्य सरकार की ओर से इस घोटाले को लेकर कोई स्पष्ट सफाई नहीं दी गई है, जिससे शंका और गहराती जा रही है। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब प्रदेश में कई अस्पतालों में बेड, दवाइयों और स्टाफ की कमी है, तब इतनी बड़ी रकम आखिर किस आधार पर एम्बुलेंस सेवा के नाम पर खर्च की गई?

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