एम्स भोपाल की सर्वाइकल कैंसर स्क्रीनिंग तकनीक को अंतरराष्ट्रीय पहचान, संयुक्त राष्ट्र SDG पुरस्कार और FRSB फेलोशिप से सम्मानित
कम लागत वाली पोर्टेबल स्क्रीनिंग डिवाइस ग्रामीण महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर की समय पर पहचान में बनेगी मदद
भोपाल। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भोपाल ने चिकित्सा अनुसंधान के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। संस्थान के जैवरसायन विभाग की प्रो. (डॉ.) रश्मि चौधरी के नेतृत्व में विकसित सर्वाइकल कैंसर स्क्रीनिंग संबंधी शोध को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान मिली है। इस शोध को वैश्विक स्वास्थ्य के क्षेत्र में संभावित योगदान के लिए संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (SDG) पुरस्कार के लिए चुना गया है। साथ ही प्रो. चौधरी को जीव विज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए रॉयल सोसाइटी ऑफ बायोलॉजी (FRSB) की प्रतिष्ठित फेलोशिप से भी सम्मानित किया गया है।
अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में प्रस्तुत किया शोध
प्रो. डॉ. रश्मि चौधरी ने 4 से 7 जून 2026 के दौरान वाशिंगटन डी.सी. (अमेरिका) में आयोजित ASM Microbe Health Meeting 2026 में अपना शोध प्रस्तुत किया। यह शोध भारत सरकार के स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (Department of Health Research-DHR) द्वारा वित्तपोषित ग्रांट-इन-एड परियोजना के अंतर्गत किया गया।
सर्वाइकल कैंसर की समय पर पहचान पर केंद्रित शोध
यह अध्ययन महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर की सामुदायिक स्तर पर बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग पर आधारित है। शोध के दौरान भोपाल और आसपास के जिलों की स्वस्थ महिलाओं से लिए गए वैजाइनल स्वैब नमूनों में हाई-रिस्क ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (HPV-16 और HPV-18) के साथ Ki-67 और p16INK4a जैसे महत्वपूर्ण बायोमार्कर्स का परीक्षण किया गया।
इन बायोमार्कर्स की सहायता से महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर के जोखिम की शुरुआती पहचान संभव हो सकती है, जिससे समय रहते उपचार और बचाव के उपाय शुरू किए जा सकें।
ग्रामीण क्षेत्रों के लिए विकसित की गई कम लागत वाली स्क्रीनिंग डिवाइस
शोध के दौरान यह सामने आया कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में पैप स्मीयर और उन्नत जांच सुविधाओं की सीमित उपलब्धता के कारण ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों की अनेक महिलाओं में बीमारी का पता देर से चल पाता है। जांच की लागत, प्रयोगशाला सुविधाओं की कमी और रिपोर्ट मिलने में लगने वाला समय भी नियमित स्क्रीनिंग में बाधा बनता है।
इन चुनौतियों को देखते हुए एम्स भोपाल की शोध टीम ने कम लागत वाली, पोर्टेबल और USB आधारित पॉइंट-ऑफ-केयर स्क्रीनिंग डिवाइस विकसित की है। इस उपकरण को संचालित करने के लिए अत्याधुनिक प्रयोगशाला की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए इसका उपयोग प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और संसाधन-सीमित क्षेत्रों में भी आसानी से किया जा सकता है।
यह तकनीक HPV-16, HPV-18 तथा संबंधित बायोमार्कर्स के आधार पर महिलाओं को उच्च, मध्यम और निम्न जोखिम श्रेणियों में वर्गीकृत करने में सहायता करेगी, जिससे समय पर रेफरल, निगरानी और उपचार संभव हो सकेगा।
WHO के 2040 लक्ष्य में मिल सकती है मदद
विशेषज्ञों के अनुसार, HPV संक्रमण से सर्वाइकल कैंसर विकसित होने में सामान्यतः 10 से 12 वर्ष का समय लग सकता है। ऐसे में शुरुआती चरण में स्क्रीनिंग और पहचान से बीमारी को रोका जा सकता है।
एम्स भोपाल द्वारा विकसित यह तकनीक विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और भारत सरकार के वर्ष 2040 तक सर्वाइकल कैंसर उन्मूलन के लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।
कार्यपालक निदेशक ने दी बधाई
एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक एवं मुख्य कार्यपालक अधिकारी प्रो. (डॉ.) माधवानन्द कर ने प्रो. डॉ. रश्मि चौधरी और उनकी पूरी टीम को इस उपलब्धि पर बधाई दी।
उन्होंने कहा कि एम्स जैसे संस्थानों की जिम्मेदारी केवल गुणवत्तापूर्ण उपचार देना ही नहीं, बल्कि समाज की जरूरतों के अनुरूप सस्ती, प्रभावी और सुलभ स्वास्थ्य तकनीकों का विकास करना भी है। उन्होंने शोधकर्ताओं को जनहित से जुड़े ट्रांसलेशनल रिसर्च को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली दोहरी उपलब्धि
इस शोध को वैश्विक स्वास्थ्य और सतत विकास में संभावित योगदान के लिए अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय से व्यापक सराहना मिली। इसी आधार पर इसे ASM Journals द्वारा प्रतिष्ठित संयुक्त राष्ट्र SDG पुरस्कार के लिए चुना गया।
इसके अलावा 1 जुलाई 2026 से प्रो. (डॉ.) रश्मि चौधरी को रॉयल सोसाइटी ऑफ बायोलॉजी (FRSB) का फेलो नामित किया गया, जो जीव विज्ञान और मानव स्वास्थ्य के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान का अंतरराष्ट्रीय सम्मान है।