Narayan Vyas देश के उन चुनिंदा पुरातत्वविदों में शामिल हैं, जिन्होंने भारतीय सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण और शोध को जन-जागरूकता से जोड़ने का काम किया। Droupadi Murmu द्वारा पद्मश्री सम्मान से अलंकृत डॉ. व्यास ने कहा कि अब उनकी जिम्मेदारी और बढ़ गई है तथा वे आने वाली पीढ़ियों को धरोहर संरक्षण के प्रति जागरूक करने का काम और अधिक व्यापक स्तर पर करेंगे।
प्रख्यात पुरातत्वविद डॉ. व्यास से प्रोफेसर Arun Kumar Khobre की विशेष बातचीत में उन्होंने अपने जीवन, पुरातत्व यात्रा और धरोहर संरक्षण को लेकर कई महत्वपूर्ण अनुभव साझा किए।
भीमबैठका से शुरू हुई पुरातत्व यात्रा
Narayan Vyas ने बताया कि उनकी प्रारंभिक शिक्षा उज्जैन में हुई और वर्ष 1970 में उन्होंने प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति में स्नातकोत्तर किया। इसके बाद उन्होंने दिल्ली स्थित स्कूल ऑफ आर्कियोलॉजी से पुरातत्व में पीजी डिप्लोमा प्राप्त किया।
उन्होंने कहा कि प्रसिद्ध पुरातत्वविद V. S. Wakankar के संपर्क में आने के बाद उनके जीवन की दिशा बदल गई। उन्होंने बैंक और एलआईसी की नौकरी छोड़कर पुरातत्व को अपना जीवन समर्पित कर दिया।
डॉ. व्यास ने बताया कि भीमबैठका क्षेत्र में डॉ. वाकणकर के साथ लगभग 10 किलोमीटर के सर्वेक्षण में उन्होंने 500 से अधिक चित्रित शैलाश्रयों का अध्ययन किया।
Bhimbetka Rock Shelters, Sanchi Stupa और Rani ki Vav जैसे विश्व धरोहर स्थलों के संरक्षण और अध्ययन में उनके योगदान को विशेष रूप से सराहा जाता है।
“सेवानिवृत्ति के बाद भी पुरातत्व नहीं छोड़ा”
डॉ. व्यास ने कहा कि अधिकांश लोग सेवानिवृत्ति के बाद आराम पसंद करते हैं, लेकिन उन्होंने अगले ही दिन से स्वतंत्र रूप से पुरातत्व शोध और धरोहर जागरूकता का कार्य शुरू कर दिया।
उन्होंने बताया कि विद्यार्थियों, शोधार्थियों और आम नागरिकों को भारतीय विरासत से जोड़ने के लिए वे लगातार प्रदर्शनियां और संवाद कार्यक्रम आयोजित करते रहे हैं। भोपाल, खजुराहो, उज्जैन, इंदौर, मांडव, भीमबैठका और दिल्ली सहित कई शहरों में वे 50 से अधिक प्रदर्शनी लगा चुके हैं।
इन प्रदर्शनों में आदिमानव के पत्थर के औजार, प्राचीन सिक्के, मिट्टी के पात्र, ऐतिहासिक दस्तावेज और डाक टिकट जैसी सामग्री शामिल रहती है।
ग्रेट वॉल ऑफ इंडिया की खोज में योगदान
Narayan Vyas ने रायसेन क्षेत्र में “ग्रेट वॉल ऑफ इंडिया” से जुड़ी खोजों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार मध्यप्रदेश की ऐतिहासिक संरचनाओं और शैलचित्रों के दस्तावेजीकरण में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा है।
उन्हें पुरातत्व क्षेत्र में राष्ट्रीय वाकणकर सम्मान सहित कई प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। उनका नाम Limca Book of Records में भी दर्ज है।
युवाओं के लिए दिया संदेश
आज की युवा पीढ़ी के बारे में पूछे गए प्रश्न पर डॉ. व्यास ने कहा कि मोबाइल और डिजिटल दुनिया के बीच युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों और विरासत से जुड़ना बेहद जरूरी है।
उन्होंने कहा कि भारत की धरोहर केवल इतिहास नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की पहचान है। यदि समाज अपनी विरासत के प्रति सजग रहेगा तो भविष्य की पीढ़ियां भी उससे प्रेरणा ले सकेंगी।
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उनकी पत्नी Sadhana Vyas ने पुरातत्व और धरोहर संरक्षण के कार्यों में हमेशा उनका सहयोग किया है।
पद्मश्री डॉ. नारायण व्यास बोले — “धरोहरों के प्रति जागरूकता फैलाना ही जीवन का उद्देश्य”
