नई दिल्ली । यदि चीन बलूचिस्तान में सेना उतारने की दिशा में आगे बढ़ता है, तो यह महज़ पाकिस्तान का आंतरिक मामला नहीं रह जाता, बल्कि यह सीधे तौर पर भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन जाता है। हाल ही में एक बलूच नेता द्वारा भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर को भेजी गई चेतावनी को काग़ज़ का साधारण पत्र मानना भूल होगी। यह पत्र आने वाले बड़े भू-राजनीतिक तूफ़ान का स्पष्ट नक्शा पेश करता है, जिसमें चीन-पाकिस्तान की साझा रणनीति और भारत को घेरने की कोशिश झलकती है।
सड़क से सैनिकों तक: चीन की सुनियोजित रणनीति
चीन की चाल अचानक नहीं है। पहले उसने पाकिस्तान में सड़कें बनाईं, फिर बंदरगाहों के ज़रिए प्रवेश किया और अब बलूचिस्तान में सीधे सैनिक तैनाती की तैयारी कर रहा है। यह वही इलाका है जहां चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) पहले से विवादों में रहा है। बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों और रणनीतिक लोकेशन पर चीन की नज़र लंबे समय से रही है, और अब वह सैन्य ताकत के ज़रिए अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है।
पाकिस्तान: ज़मीन पर मालिक या किराएदार?
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल पाकिस्तान की संप्रभुता पर उठता है। आलोचकों का कहना है कि पाकिस्तान अब अपनी ही ज़मीन पर पूर्ण मालिक नहीं रहा, बल्कि वह दूसरों के लिए “किराए की छत” बनता जा रहा है। बलूचिस्तान पहले से सामाजिक-राजनीतिक दर्द से जूझ रहा है, और आशंका है कि चीनी सेना की मौजूदगी उस दर्द को और कुचल सकती है।
भारत की सुरक्षा चिंता क्यों बढ़ी?
बलूचिस्तान में चीनी सेना की तैनाती भारत के लिए दोहरे मोर्चे की स्थिति पैदा कर सकती है एक तरफ पूर्वी लद्दाख और वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC), दूसरी ओर पश्चिम में चीन-पाकिस्तान की संयुक्त गतिविधियां। गलवान घाटी की घटना के बाद भारत यह भली-भांति समझ चुका है कि शांति की सबसे मजबूत गारंटी ताकत और तैयारी होती है। भारत यह सब चुपचाप नहीं देख रहा।
2014 से पहले और आज का भारत अलग है
जो लोग यह मानते हैं कि भारत केवल कूटनीतिक बयान देकर रुक जाएगा, उन्हें यह समझना चाहिए कि आज का भारत 2014 से पहले वाला भारत नहीं है। रक्षा तैयारी, कूटनीतिक सक्रियता और रणनीतिक साझेदारियों में भारत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि वह अपने हितों की रक्षा के लिए हर आवश्यक कदम उठाएगा।
चीन-पाकिस्तान की घेराबंदी की कोशिश
विश्लेषकों के अनुसार, यह पूरी रणनीति भारत को चारों ओर से घेरने की कोशिश है—लद्दाख, हिंद महासागर और अब बलूचिस्तान के ज़रिए। लेकिन उन्हें यह भी समझ लेना चाहिए कि भारत अब घेरे में नहीं आता; भारत घेरा तोड़ना जानता है।
जयशंकर को लिखा पत्र: वैश्विक चेतावनी
बलूच नेता द्वारा विदेश मंत्री को लिखा गया पत्र केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक चेतावनी है कि एशिया में कुछ बड़ा पक रहा है। इस बार भारत दर्शक नहीं बनेगा, बल्कि एक सक्रिय खिलाड़ी की भूमिका में रहेगा।
निष्कर्ष:
भारत युद्ध नहीं चाहता, लेकिन डरकर जीना भी स्वीकार नहीं। गलवान में खून बहा, पर भारत झुका नहीं। यदि चीन ने गलत जगह कदम रखा, तो इतिहास उसे याद दिलाएगा कि भारत शांति का देश है, कमजोरी का नहीं—
“धर्मो रक्षति रक्षितः।”
बलूचिस्तान में चीन की सैन्य एंट्री की आहट: सिर्फ पाकिस्तान नहीं, भारत की सुरक्षा से जुड़ा बड़ा संकेत
