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ईरान में तख़्तापलट की आहट? सड़कों पर उतरी जनता, फ़ारसी पहचान की वापसी और सत्ता के ख़िलाफ़ उबाल

ईरान । सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख़्त गिराए जाएंगे… हम देखेंगे।” फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की यह पंक्ति आज ईरान की मौजूदा स्थिति पर सटीक बैठती नज़र आ रही है। ईरान में तख़्तापलट की संभावना अब केवल राजनीतिक विश्लेषण या अफ़वाह नहीं लगती, बल्कि ज़मीनी हालात इसे एक गंभीर संकेत में बदल रहे हैं। देशभर में बढ़ते विरोध, इंटरनेट बंदी और सत्ता के प्रतीकों को चुनौती देते दृश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बने हुए हैं।

ईरान की सड़कों पर एक बार फिर जनता खुलकर सामने आ गई है। आर्थिक संकट, सामाजिक पाबंदियों और राजनीतिक दमन से नाराज़ लोग सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं। हालात की गंभीरता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रशासन को कई इलाकों में इंटरनेट सेवाएं बंद करनी पड़ीं, ताकि सूचनाओं और विरोध की आवाज़ को रोका जा सके।

सबसे प्रतीकात्मक और चर्चा में रहने वाला दृश्य है—इस्लामिक झंडे की जगह शेर और सूरज वाले पारंपरिक फ़ारसी झंडे का लहराना। विशेषज्ञ इसे केवल सत्ता विरोध नहीं, बल्कि फ़ारसी सांस्कृतिक पहचान की वापसी के संकेत के रूप में देख रहे हैं। यह झंडा ईरान की उस ऐतिहासिक पहचान से जुड़ा है, जो इस्लामिक क्रांति से पहले देश की पहचान हुआ करती थी।

गौरतलब है कि कुछ दशक पहले यही जनता सड़कों पर उतरी थी और एक राजशाही व्यवस्था को हटाकर धार्मिक शासन की स्थापना की थी। तब नारे आज़ादी और बदलाव के थे, लेकिन समय के साथ वही व्यवस्था समाज के लिए सख़्त और सीमित होती चली गई। आज वही समाज, वही लोग, वर्षों बाद पीछे मुड़कर देख रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ईरान में चल रहा यह आंदोलन एक गहरे आत्ममंथन का परिणाम है। जनता शायद पहली बार सामूहिक रूप से यह स्वीकार कर रही है कि अतीत में एक ऐतिहासिक भूल हुई थी। मौजूदा हालात यह संकेत दे रहे हैं कि ईरान केवल विरोध नहीं देख रहा, बल्कि अपने भविष्य को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश कर रहा है।

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