ईरान में इस्लामिक शासन के ख़िलाफ़ तीखा विरोध: ‘इस्लाम हमारा धर्म नहीं’ के नारे, 9.2 करोड़ लोगों की पहचान पर बहस

ईरान में जारी विरोध प्रदर्शनों ने अब केवल राजनीतिक सत्ता को ही नहीं, बल्कि धार्मिक व्यवस्था को भी खुली चुनौती देना शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया और ज़मीनी आंदोलनों में ईरानी प्रदर्शनकारियों के कुछ बयान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में हैं, जिनमें यह दावा किया जा रहा है कि इस्लाम ईरानियों की स्वैच्छिक आस्था नहीं, बल्कि इतिहास में जबरन थोपी गई व्यवस्था रही है।
ईरान के कई हिस्सों में सरकार और इस्लामिक शासन के ख़िलाफ़ हो रहे प्रदर्शनों के दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों ने बेहद कड़े और भावनात्मक नारे लगाए हैं। वायरल हो रहे बयानों में कहा जा रहा है कि “इस्लाम हमारा धर्म नहीं है, इसे ईरानियों पर अत्याचार, हत्याओं और दमन के ज़रिए थोपा गया था।” प्रदर्शनकारियों का दावा है कि इसी धार्मिक शासन ने ईरानी समाज को दशकों तक राजनीतिक और सामाजिक रूप से गुलाम बनाए रखा।
इन बयानों के साथ यह तुलना भी की जा रही है कि दुनिया के कई हिस्सों में किसी एक व्यक्ति के इस्लाम धर्म अपनाने के वीडियो को खुशी के साथ साझा किया जाता है, जबकि ईरान में कथित रूप से करोड़ों लोग इस्लामिक शासन और धार्मिक व्यवस्था को खुले तौर पर अस्वीकार कर रहे हैं। प्रदर्शनकारी इसे केवल धर्म का विरोध नहीं, बल्कि स्वतंत्र पहचान और ऐतिहासिक आत्मसम्मान की लड़ाई बता रहे हैं।
हाल के दिनों में शेर और सूरज वाले पारंपरिक फ़ारसी झंडे का दोबारा दिखना भी इसी भावना से जोड़ा जा रहा है। विश्लेषकों के अनुसार यह संकेत है कि ईरान में विरोध अब केवल महंगाई, बेरोज़गारी या महिलाओं के अधिकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह धार्मिक शासन की वैधता पर सवाल बन चुका है।
हालांकि, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि ईरान का समाज विविधताओं से भरा है और सभी नागरिक इन विचारों से सहमत हों, ऐसा कहना जल्दबाज़ी होगी। फिर भी, मौजूदा हालात यह स्पष्ट कर रहे हैं कि ईरान में धर्म, सत्ता और पहचान को लेकर एक गहरी और ऐतिहासिक बहस शुरू हो चुकी है, जिसका असर देश के भविष्य पर निर्णायक हो सकता है।



