कुवैत का टायर कब्रिस्तान: सालों से जलती आग, अंतरिक्ष से दिखता प्रदूषण और जलवायु बहस का दोहरा मापदंड

कुवैत । जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण की वैश्विक बहस में अक्सर कुछ परंपराओं और समुदायों को निशाने पर लिया जाता है, लेकिन दुनिया के सबसे बड़े और खतरनाक प्रदूषण स्रोतों पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है। ऐसा ही एक उदाहरण है कुवैत का दुनिया का सबसे बड़ा टायर कब्रिस्तान, जहां लगी आग वर्षों से जल रही है और जिसका धुआं अंतरिक्ष से भी दिखाई देता है।
कुवैत का टायर कब्रिस्तान क्या है
कुवैत के सुलैबीया (Sulaibiya) क्षेत्र में लाखों-करोड़ों पुराने टायरों का विशाल भंडार वर्षों से जमा है। इसे दुनिया का सबसे बड़ा टायर ग्रेवयार्ड माना जाता है। यहां समय-समय पर लगने वाली आग महीनों तक नहीं बुझती, क्योंकि रबर और रसायनों से बने टायर अत्यंत ज्वलनशील होते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार टायरों के जलने से निकलने वाला धुआं कार्बन ब्लैक, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, जहरीले रसायन वायुमंडल में घोल देता है, जो मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए बेहद खतरनाक है।
अंतरिक्ष से दिखने वाला प्रदूषण
कुवैत के इस टायर कब्रिस्तान में लगी आग की तस्वीरें कई बार सैटेलाइट इमेज में कैद हो चुकी हैं। यह साबित करता है कि औद्योगिक और कॉर्पोरेट स्तर पर होने वाला प्रदूषण कितना विशाल और दीर्घकालिक प्रभाव डालता है। यह आग न सिर्फ स्थानीय पर्यावरण, बल्कि वैश्विक जलवायु पर भी असर डालती है।
जलवायु बहस में दोहरा रवैया?
इसके बावजूद जब जलवायु परिवर्तन की बात होती है, तो बहस का केंद्र अक्सर हिंदुओं के त्योहार, दीपावली की आतिशबाजी, गौमाता और पशुपालन को बना दिया जाता है। सवाल यह उठता है कि क्या जलवायु संकट के लिए केवल सांस्कृतिक परंपराएं ही जिम्मेदार हैं, या फिर बड़े पैमाने पर हो रहे औद्योगिक प्रदूषण, युद्ध, तेल-गैस उद्योग और कचरा प्रबंधन की विफलता भी उतनी ही जिम्मेदार है?
वैश्विक प्रदूषण के असली स्रोत
पर्यावरण विशेषज्ञ मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारण हैं, भारी उद्योग और कारखाने, जीवाश्म ईंधन का अंधाधुंध उपयोग, कचरे का वैज्ञानिक निपटान न होना, बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई, युद्ध और सैन्य गतिविधियां इनके मुकाबले सांस्कृतिक आयोजनों का प्रभाव अल्पकालिक और सीमित होता है।
निष्कर्ष: निष्पक्षता जरूरी
कुवैत का टायर कब्रिस्तान इस बात का प्रतीक है कि वैश्विक प्रदूषण की जड़ें कहीं और हैं, लेकिन चर्चा कहीं और मोड़ दी जाती है। जलवायु संरक्षण की लड़ाई तब ही सार्थक होगी, जब सभी देशों, उद्योगों और गतिविधियों पर समान और निष्पक्ष दृष्टि से जिम्मेदारी तय की जाए। पर्यावरण बचाने के लिए परंपराओं को दोष देने से ज्यादा जरूरी है, दुनिया के सबसे बड़े और खतरनाक प्रदूषण स्रोतों पर ईमानदारी से सवाल उठाना।



