
जापान में धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक परंपराओं के बीच टकराव एक बार फिर सुर्खियों में है। हाल ही में जापान सरकार द्वारा देश में मुस्लिम कब्रिस्तानों के निर्माण की अनुमति देने से इनकार किए जाने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज़ हो गई है। सरकार का कहना है कि जापान में दाह संस्कार सदियों पुरानी परंपरा है, इसलिए विदेशी समुदायों को स्थानीय नियमों के अनुरूप ही चलना चाहिए। वहीं, मुस्लिम समुदाय का कहना है कि दफ़नाना उनका धार्मिक कर्तव्य है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
जापान का रुख: दफ़न संस्कृति हमारी परंपरा नहीं
जापान सरकार ने बयान जारी किया कि देश में भूमि बेहद सीमित है और श्मशान स्थलों पर दाह संस्कार ही पारंपरिक प्रथा है। अधिकारियों के अनुसार, दफ़नाने की अनुमति देना भूमि व्यवस्था और सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी नियमों के विपरीत माना जाता है। सरकार का स्पष्ट मत है कि मुसलमानों के लिए उचित तरीका यही है कि वे अपने अवशेषों को अपने देश वापस ले जाएँ और वहीं दफ़नाएँ।
यह कठोर बयान मुस्लिम समुदाय के लिए चिंता का विषय बन गया है, क्योंकि जापान में काम करने वाले लाखों विदेशी मुसलमान ऐसी स्थिति में सवालों के घेरे में हैं कि मृत्यु के बाद उनकी धार्मिक प्रक्रियाएं कैसे पूरी होंगी।
मुस्लिम समुदाय की आपत्ति और बढ़ती चर्चा
मुस्लिम संगठनों का कहना है कि यह निर्णय धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन है और बहुसांस्कृतिक समाज के सिद्धांतों के खिलाफ है। उनका तर्क है कि जापान में जहां अन्य धर्मों और समुदायों को उनके रीति-रिवाज़ों के अनुसार स्थान मिलता है, वहीं मुस्लिमों के लिए कब्रिस्तानों की अनुमति न देना भेदभावपूर्ण है। साथ ही, कई मानवाधिकार समूहों ने जापानी नीति में बदलाव की मांग की है, ताकि लंबे समय से जापान में रहने और काम करने वाले मुसलमानों के लिए सम्मानजनक विकल्प उपलब्ध हो सकें।
जापान का यह निर्णय सांस्कृतिक परंपरा, भूमि प्रबंधन और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच एक जटिल टकराव को उजागर करता है। आने वाले समय में यह मुद्दा न केवल जापान की आंतरिक नीति बल्कि वैश्विक धार्मिक अधिकारों की चर्चाओं का भी हिस्सा बनेगा।



