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भोपाल में जल शुद्धिकरण व्यवस्था चरमराई: फिल्टर मीडिया ऑपरेटर और केमिस्ट नहीं, कैसे मिले जनता को स्वच्छ पेयजल?

भोपाल। राजधानी भोपाल में स्वच्छ पेयजल आपूर्ति की व्यवस्था गंभीर संकट से गुजर रही है। नगर निगम द्वारा जल शुद्धिकरण और परीक्षण से जुड़े महत्वपूर्ण पद वर्षों से खाली पड़े हैं, जिसके कारण शहरवासियों को शुद्ध पानी उपलब्ध कराने की प्रक्रिया लगभग ठप हो चुकी है। स्थिति यह है कि आज नगर निगम में पानी की गुणवत्ता जांचने वाला एक भी योग्य केमिस्ट, फिल्टर मीडिया ऑपरेटर या वालमेन मौजूद नहीं है।

बिना विशेषज्ञों के चल रही जलापूर्ति व्यवस्था

जानकारी के अनुसार, समय के साथ नगर निगम के केमिस्ट, फिल्टर ऑपरेटर, असिस्टेंट मीडिया ऑपरेटर और वालमेन जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत कर्मचारी सेवानिवृत्त होते गए, लेकिन उनकी जगह नई भर्तियां नहीं की गईं। परिणामस्वरूप जल शुद्धिकरण से जुड़ी पूरी व्यवस्था अस्थायी और अप्रशिक्षित कर्मचारियों के भरोसे चल रही है। स्थिति यह है कि फिल्टर प्लांटों पर न तो प्रशिक्षित स्टाफ है और न ही लॉग बुक का सही रखरखाव हो रहा है। इससे यह जानकारी ही उपलब्ध नहीं हो पाती कि कितना पानी फिल्टर हुआ, उसमें कितनी मात्रा में क्लोरीन मिलाई गई और कितनी अशुद्धियां हटाई गईं।

चार प्रमुख लैब – लेकिन सभी पद खाली

भोपाल में पानी की गुणवत्ता जांचने के लिए नगर निगम की चार प्रमुख प्रयोगशालाएं संचालित हैं बैरागढ़, बीएचईएल, यार्ड क्लब (सीएम हाउस के पास), पुलबोगदा। इन सभी लैब में पूर्व में केमिस्ट तैनात रहते थे, जो नियमित रूप से पानी की जांच करते थे। लेकिन वर्तमान में चारों लैब के केमिस्ट पद वर्षों से खाली पड़े हैं, जिससे पानी की वैज्ञानिक जांच पूरी तरह प्रभावित हो चुकी है।

12 फिल्टर ऑपरेटर पद – सभी रिक्त

शहर के विभिन्न जल प्रदाय केंद्रों पर फिल्टर मीडिया ऑपरेटर और असिस्टेंट मीडिया ऑपरेटर के कुल 12 पद स्वीकृत हैं, जिनका मुख्य काम पानी में उचित मात्रा में क्लोरीन या ब्लीचिंग पाउडर मिलाकर उसे शुद्ध करना था।
लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि ये सभी पद खाली हैं और इन स्थानों पर अयोग्य कर्मचारियों से काम कराया जा रहा है। इस कारण पानी में क्लोरीन की मात्रा कभी अधिक, कभी कम हो जाती है, तय मानक (1.2 PPM) के अनुसार शुद्धिकरण नहीं हो पाता, जनता तक प्रदूषित पानी पहुंचने का खतरा बना रहता है

वालमेन व्यवस्था भी पूरी तरह ठप

पहले हर वार्ड में एक वालमेन तैनात रहता था, जो, घर-घर जाकर पानी की गुणवत्ता जांचता था। क्लोरीन की मात्रा का परीक्षण करता था, गड़बड़ी मिलने पर सैंपल लेकर लैब भेजता था
लेकिन अब यह पूरी व्यवस्था लगभग समाप्त हो चुकी है। वर्षों से किसी उपभोक्ता के घर जाकर पानी की जांच करने वाला कोई कर्मचारी नहीं पहुंचा है। लोग केवल शिकायत दर्ज कराने तक सीमित रह गए हैं।

इंदौर जैसी घटना की पुनरावृत्ति का खतरा

कुछ दिन पूर्व इंदौर में दूषित पानी के कारण गंभीर स्वास्थ्य संकट सामने आया था। उसके बाद भोपाल में भी चार स्थानों से पानी के सैंपल लिए गए, जो प्रदूषित पाए गए। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द ही जल शुद्धिकरण से जुड़े खाली पदों पर भर्ती नहीं की गई, तो राजधानी भोपाल में भी इंदौर जैसी बड़ी घटना घटित हो सकती है।

पीएचई विभाग के केमिस्ट का भी उपयोग नहीं

नगर निगम में पीएचई विभाग से एक केमिस्ट मनोज निगम प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत हैं, लेकिन वे विधानसभा के सामने स्थित पीएचई कार्यालय में बैठते हैं और नगर निगम की किसी भी लैब में नियमित कार्य नहीं देखते।
आरोप है कि वेतन नगर निगम से लेने के बावजूद उनकी सेवाओं का सही उपयोग नहीं हो पा रहा है।

लॉग बुक व्यवस्था भी बंद

निगम के किसी भी पंप हाउस पर अब लॉग बुक का संधारण नहीं हो रहा है, जबकि पहले इसमें दर्ज होता था कितना पानी फिल्टर हुआ, कितना कचरा निकला, कितनी मात्रा में क्लोरीन मिलाई गई, कितनी मात्रा में शुद्ध पानी सप्लाई हुआ। लॉग बुक न होने से जल शुद्धिकरण प्रक्रिया पूरी तरह अपारदर्शी हो गई है।


जिम्मेदारों के बयान

मालती राय, महापौर – नगर निगम भोपाल
“शासन स्तर पर इस संबंध में चर्चा चल रही है। हम लगातार प्रयास कर रहे हैं, जल्द ही भर्ती प्रक्रिया शुरू की जाएगी।”

शबिस्ता जकी, नेता प्रतिपक्ष – नगर निगम भोपाल

नगर निगम में पेयजल का संचालन सही तरीके से नहीं हो रहा है। क्लोरीन की जांच तक नहीं हो पा रही। इंदौर की घटना के बाद भोपाल में लिए गए सैंपल भी फेल पाए गए, जो बेहद चिंताजनक है।

निष्कर्ष

भोपाल जैसे बड़े शहर में जहां लाखों लोग नगर निगम के जल प्रदाय पर निर्भर हैं, वहां जल शुद्धिकरण से जुड़े महत्वपूर्ण पदों का खाली रहना अत्यंत गंभीर विषय है।
यदि समय रहते केमिस्ट, फिल्टर मीडिया ऑपरेटर, वालमेन जैसे पदों पर नियुक्तियां नहीं की गईं, तो शहरवासियों के स्वास्थ्य पर इसका बड़ा दुष्प्रभाव पड़ सकता है। अब देखना होगा कि नगर निगम और शासन इस गंभीर समस्या पर कब तक ठोस कदम उठाते हैं।

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