बुल्गारिया में एम्स भोपाल का परचम: फोरेंसिक विज्ञान के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारतीय शोध को मिली वैश्विक पहचान

भोपाल, 6 जून 2026। चिकित्सा अनुसंधान और वैज्ञानिक नवाचार के क्षेत्र में लगातार नई उपलब्धियां हासिल कर रहा एम्स भोपाल अब फोरेंसिक विज्ञान के अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है। संस्थान के फोरेंसिक मेडिसिन विभाग के विशेषज्ञों, युवा शोधकर्ताओं और पीएचडी विद्यार्थियों ने बुल्गारिया की राजधानी सोफिया में आयोजित विश्वस्तरीय सम्मेलन में अपने शोध कार्यों से न केवल भारत का प्रतिनिधित्व किया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की सराहना भी प्राप्त की।

25 से 30 मई 2026 तक आयोजित 24वीं ट्राइएनियल मीटिंग ऑफ इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ फोरेंसिक साइंसेज (IAFS) में एम्स भोपाल की टीम ने फोरेंसिक मेडिसिन, पोस्टमार्टम विज्ञान, फोरेंसिक इमेजिंग, मृत्यु उपरांत विश्लेषण और आत्महत्या अध्ययन जैसे जटिल विषयों पर अपने शोध प्रस्तुत किए। विशेषज्ञों ने इन अध्ययनों को वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बताते हुए भारत में बढ़ती शोध क्षमता का उदाहरण माना।

घावों और मस्तिष्क रक्तस्राव की समय-सीमा निर्धारण पर शोध को मिली सराहना

फोरेंसिक मेडिसिन विभाग की प्रोफेसर डॉ. जयंती यादव ने सम्मेलन में दो महत्वपूर्ण शोध पत्र प्रस्तुत किए। उनके अध्ययन घावों की आयु निर्धारण तथा सिर की चोटों से जुड़े रक्तस्राव के समय निर्धारण पर केंद्रित थे।

फोरेंसिक जांच में यह जानकारी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि इससे अपराध, दुर्घटना या अन्य संदिग्ध परिस्थितियों में चोट लगने के वास्तविक समय का अनुमान लगाने में मदद मिलती है। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने उनके शोध को वैज्ञानिक रूप से उपयोगी और व्यवहारिक बताया।

फोरेंसिक जांच के लिए अभिनव तकनीकों का प्रदर्शन

प्रोफेसर डॉ. राघवेंद्र कुमार विदुआ ने सम्मेलन में तीन शोध प्रस्तुत किए, जिनमें फोरेंसिक नमूनों को सुरक्षित रखने के लिए विकसित अभिनव सैंपल ड्रायर, मृत्यु उपरांत जैविक नमूनों के विश्लेषण और मेडिकोलीगल जांच में आधुनिक फोरेंसिक रेडियोलॉजी के उपयोग जैसे विषय शामिल थे।

विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक इमेजिंग तकनीकें भविष्य में पोस्टमार्टम और अपराध जांच की प्रक्रियाओं को अधिक सटीक और वैज्ञानिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

आत्महत्या अध्ययन पर युवा शोधकर्ता की प्रस्तुति बनी आकर्षण का केंद्र

जूनियर रेजिडेंट डॉ. अबर्न्ना श्री एस. बी. ने आत्महत्या से संबंधित मामलों में मस्तिष्क और अंतःस्रावी ग्रंथियों में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों पर आधारित अध्ययन प्रस्तुत किया।

उनके शोध में पीनियल ग्रंथि के विश्लेषण को विशेष रूप से अभिनव और वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण माना गया। विशेषज्ञों ने इसे मानसिक स्वास्थ्य, न्यूरोबायोलॉजी और फोरेंसिक विज्ञान के बीच संबंधों को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास बताया।

मृत्यु के समय का अनुमान लगाने में प्रोटिओमिक्स तकनीक पर शोध

पीएचडी शोधार्थी अरुण कोरी ने उष्णकटिबंधीय परिस्थितियों वाले भारत में मृत्यु के बाद बीते समय (Post Mortem Interval) के अधिक सटीक अनुमान के लिए प्रोटिओमिक तकनीकों के उपयोग पर शोध प्रस्तुत किया।

मृत्यु का समय निर्धारित करना फोरेंसिक विज्ञान की सबसे जटिल चुनौतियों में से एक माना जाता है। उनके शोध को इस क्षेत्र के अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने विशेष रुचि के साथ देखा और भविष्य में सहयोग की संभावनाओं पर भी चर्चा की।

पोस्टमार्टम माइक्रोबायोलॉजी पर शोध को भी मिली प्रशंसा

पीएचडी शोधार्थी अस्विनी चंद्रन ने मृत्यु के कारणों की पहचान को अधिक सटीक बनाने के लिए पोस्टमार्टम माइक्रोबायोलॉजी और बायोमार्कर तकनीकों के समन्वय पर आधारित शोध प्रस्तुत किया।

विशेषज्ञों ने उनके अध्ययन को आधुनिक फोरेंसिक जांच की दिशा में उपयोगी कदम बताते हुए शोध के प्रति उनके समर्पण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की सराहना की।

अंतरराष्ट्रीय ट्रैवल ग्रांट से मिला सम्मान

सम्मेलन में भाग लेने वाले शोधकर्ताओं की उपलब्धियों को और अधिक प्रतिष्ठा तब मिली जब डॉ. जयंती यादव को एएनआरएफ (ANRF) इंटरनेशनल ट्रैवल ग्रांट तथा डॉ. अबर्न्ना श्री एस. बी. को आईसीएमआर इंटरनेशनल ट्रैवल ग्रांट प्रदान किया गया।

यह सम्मान उन वैज्ञानिकों को दिया जाता है जिनके शोध कार्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण माने जाते हैं और जिनसे वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय को लाभ मिलने की संभावना होती है।

वैश्विक पहचान की ओर बढ़ रहा एम्स भोपाल

एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक एवं मुख्य कार्यपालन अधिकारी प्रो. (डॉ.) माधवानन्द कर ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि संस्थान में शोध आधारित चिकित्सा शिक्षा और वैज्ञानिक नवाचार को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय शोधकर्ताओं की उपस्थिति न केवल ज्ञान के आदान-प्रदान को बढ़ाती है, बल्कि भारत की वैज्ञानिक क्षमता को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

उन्होंने सभी शोधकर्ताओं, संकाय सदस्यों और विद्यार्थियों को बधाई देते हुए विश्वास व्यक्त किया कि भविष्य में भी एम्स भोपाल चिकित्सा अनुसंधान और फोरेंसिक विज्ञान के क्षेत्र में नई उपलब्धियां हासिल करता रहेगा।

क्यों महत्वपूर्ण है यह उपलब्धि?

फोरेंसिक विज्ञान आज केवल अपराध जांच तक सीमित नहीं है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया, सार्वजनिक स्वास्थ्य, मृत्यु विश्लेषण, आपदा प्रबंधन और वैज्ञानिक साक्ष्य प्रणाली का महत्वपूर्ण आधार बन चुका है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय शोधकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी न केवल देश की वैज्ञानिक प्रतिष्ठा को मजबूत करती है, बल्कि वैश्विक शोध सहयोग के नए अवसर भी खोलती है।

सोफिया में आयोजित इस सम्मेलन में एम्स भोपाल की सफलता इस बात का संकेत है कि भारतीय चिकित्सा संस्थान अब केवल उपचार और शिक्षा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि विश्वस्तरीय अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में भी अपनी प्रभावशाली पहचान बना रहे हैं।

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