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बीमा धोखाधड़ी का बड़ा खुलासा: सड़क दुर्घटना मुआवजे के 80,000 करोड़ रुपए अटके, लाखों पीड़ित परिवार न्याय से वंचित

नई दिल्ली । देश में सड़क दुर्घटना पीड़ितों के लिए बनाई गई बीमा मुआवजा व्यवस्था आज खुद सवालों के घेरे में है। बीमा धोखाधड़ी और प्रशासनिक लापरवाही के चलते सड़क दुर्घटना मुआवजे के नाम पर करीब 80,000 करोड़ रुपए की भारी-भरकम राशि बीमा कंपनियों के पास अटकी हुई है। हैरानी की बात यह है कि 10 लाख से अधिक मुआवजा दावे लंबित हैं और पीड़ित परिवार वर्षों से न्याय और राहत के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं।

सड़क हादसों में जान गंवाने वालों या गंभीर रूप से घायल पीड़ितों के लिए मोटर वाहन अधिनियम के तहत बीमा मुआवजा अनिवार्य किया गया है। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि बीमा कंपनियां तकनीकी खामियों, दस्तावेज़ी आपत्तियों और लंबी कानूनी प्रक्रिया का हवाला देकर भुगतान टालती आ रही हैं। इसका सीधा असर उन परिवारों पर पड़ रहा है, जिनके लिए यह मुआवजा जीवन-यापन का एकमात्र सहारा है।

सूत्रों के अनुसार लंबित दावों की संख्या 10 लाख के पार जा चुकी है, जबकि हजारों मामले 5 से 10 वर्षों से अटके हुए हैं। कई मामलों में पीड़ितों की मृत्यु के बाद उनके परिजन आज भी अदालतों और बीमा दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, फिर भी समाधान नहीं:
इस गंभीर स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बीमा कंपनियों और संबंधित विभागों को कार्रवाई के स्पष्ट निर्देश दिए थे। कई उच्चस्तरीय बैठकें भी हुईं, समयसीमा तय की गई, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात में कोई ठोस सुधार नहीं दिखा। भुगतान प्रक्रिया आज भी धीमी और जटिल बनी हुई है।

बड़ा सवाल:
जब पैसा मौजूद है, कानून स्पष्ट है और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश भी हैं, तो फिर पीड़ितों का हक़ कब मिलेगा?
बीमा कंपनियों की जवाबदेही कब तय होगी?

निष्कर्ष:
80,000 करोड़ रुपए का यह मुआवजा सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि लाखों उजड़े परिवारों की उम्मीद है। यदि जल्द पारदर्शी और समयबद्ध व्यवस्था नहीं बनी, तो यह बीमा धोखाधड़ी सामाजिक अन्याय का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर रह जाएगी।

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