बीजेपी नेता चेतन बिष्ट और पूर्व मंडल अध्यक्ष केपी सिंह ने ‘पूर्व सैनिक’ पूरन सिंह अधिकारी को लातों से रौंदा

लखनऊ में पूर्व सैनिक से मारपीट का आरोप: बीजेपी नेताओं पर गंभीर आरोप, कुर्सी रोड की घटना से उठा कानून-व्यवस्था पर सवाल
लखनऊ। राजधानी की सड़कों पर सामने आई एक घटना ने राजनीतिक हलकों के साथ-साथ आम जनता को भी झकझोर कर रख दिया है। कुर्सी रोड क्षेत्र में सड़कों पर बीजेपी नेता चेतन बिष्ट (महानगर संयोजक) और पूर्व मंडल अध्यक्ष केपी सिंह ने मिलकर एक ‘पूर्व सैनिक’ पूरन सिंह अधिकारी को लातों से रौंदने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। घटना के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं और विपक्षी दलों ने इसे सत्ता के अहंकार और कानून-व्यवस्था की विफलता का उदाहरण बताया है।
क्या है पूरा मामला?
आरोप है कि कुर्सी रोड पर किसी विवाद के दौरान स्वयं को “पूर्व सैनिक” बताने वाले पूरन सिंह अधिकारी के साथ बीजेपी नेता चेतन बिष्ट और पूर्व मंडल अध्यक्ष केपी सिंह ने लातों से मारपीट की। प्रत्यक्षदर्शियों और वायरल हो रहे वीडियो/बयानों के अनुसार, यह घटना सार्वजनिक स्थान पर हुई, जिससे राहगीरों में अफरा-तफरी मच गई। आरोप लगाने वालों का कहना है कि राजनीतिक प्रभाव के चलते खुलेआम हिंसा की गई। हालांकि, इस मामले में पुलिस की ओर से आधिकारिक पुष्टि, एफआईआर की धाराएं और जांच की स्थिति को लेकर विस्तृत जानकारी का इंतजार किया जा रहा है।
राजनीतिक बयानबाजी तेज
घटना के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। आलोचकों ने सवाल उठाया है कि क्या यही राष्ट्रवाद है,जहां वर्दी का सम्मान तो दूर, एक पूर्व सैनिक के साथ कथित तौर पर दुर्व्यवहार किया जाए। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने मांग की है कि आरोपियों के खिलाफ निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई की जाए, चाहे उनका राजनीतिक कद कुछ भी हो।
कानून-व्यवस्था पर उठे सवाल
कुर्सी रोड की यह घटना कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े करती है। नागरिकों का कहना है कि यदि सार्वजनिक स्थान पर कथित तौर पर इस तरह की हिंसा होती है, तो आम आदमी की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी। वहीं, कुछ संगठनों ने इसे सत्ता के संरक्षण में “कानून के डर के खत्म होने” का प्रतीक बताया है।
निष्कर्ष:
लखनऊ की कुर्सी रोड पर हुई कथित घटना ने राजनीति, कानून-व्यवस्था और सामाजिक संवेदनशीलता—तीनों पर सवाल खड़े किए हैं। अब निगाहें प्रशासन और पुलिस की कार्रवाई पर हैं, जिससे सच सामने आए और यह संदेश जाए कि कानून सबके लिए समान है—चाहे वह आम नागरिक हो, पूर्व सैनिक हो या राजनीतिक पद पर बैठा व्यक्ति।





