भोपाल (मध्यप्रदेश): कोरोना महामारी के दौरान खरीदे गए रेमडेसिविर इंजेक्शन अब सरकारी लापरवाही की भेंट चढ़ गए हैं। लगभग 17 करोड़ रुपये की लागत से खरीदे गए ये कोविड-19 इलाज के जरूरी इंजेक्शन तीन साल तक गोदामों में पड़े-पड़े खराब हो गए। इसके साथ ही, इन इंजेक्शनों को स्टोर करने के लिए सरकार ने लगभग 18 लाख रुपये का किराया भी अदा किया। अब सवाल उठ रहे हैं कि जब कोरोना की दूसरी और तीसरी लहर में दवा की भारी किल्लत थी, तब यह स्टॉक क्यों नहीं उपयोग में लाया गया?
रेमडेसिविर इंजेक्शन बर्बादी: एक नजर में प्रमुख तथ्य –
वर्ष 2021 में कोरोना की दूसरी लहर के समय राज्य सरकार ने भारी मात्रा में रेमडेसिविर इंजेक्शन की खरीद की थी।
17 करोड़ रुपये की लागत से खरीदे गए ये इंजेक्शन 3 वर्षों तक स्टोरेज सेंटर में पड़े रहे।
अब इन इंजेक्शनों की एक्सपायरी डेट गुजर चुकी है और ये उपयोग लायक नहीं बचे हैं।
स्टोरेज के लिए 18 लाख रुपये अलग से खर्च किए गए लेकिन किसी स्तर पर इन्हें वितरण या उपयोग नहीं किया गया।
जनता और विशेषज्ञों में नाराजगी
स्वास्थ्य विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि जब कोरोना के इलाज में रेमडेसिविर के लिए लोग लाइनों में खड़े रहते थे, तब यही इंजेक्शन मूल्यवान जीवन बचा सकते थे, लेकिन प्रशासनिक लापरवाही के चलते यह संभव नहीं हो पाया। अब जब कोरोना का असर खत्म हो चुका है, तो यह दवाएं बेमतलब की बर्बादी बन चुकी हैं।
विपक्ष का आरोप – सरकार की जवाबदेही तय हो
विपक्षी दलों ने इस मामले में राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग से जवाब मांगा है। उनका आरोप है कि जनता के टैक्स का पैसा इस तरह अप्रभावी नीतियों और कुप्रबंधन में बर्बाद हो रहा है। मांग की जा रही है कि इस पूरे मामले की जांच हो और दोषियों पर कार्रवाई की जाए।
कोरोना काल में खरीदे गए 17 करोड़ रुपये के रेमडेसिविर इंजेक्शन गोदाम में सड़ गए, 3 साल तक स्टॉक पड़ा रहा बेकार, 18 लाख रुपये किराए में उड़ा दिए
