तहसीलदार पर ईओडब्ल्यू कार्रवाई के विरोध में प्रदेशव्यापी लामबंदी, मध्यप्रदेश के 55 जिलों में आज राजस्व अधिकारी सौंपेंगे ज्ञापन

Bhopal , Madhya Pradesh में राजस्व अधिकारियों और जांच एजेंसियों के बीच अधिकार, जवाबदेही और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। मध्यप्रदेश राजस्व अधिकारी (कनिष्ठ प्रशासनिक सेवा) संघ ने तहसीलदार स्तर के अधिकारी पर दर्ज आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) प्रकरण के विरोध में राज्यव्यापी आंदोलनात्मक रुख अपनाया है। संघ ने घोषणा की है कि प्रदेश के सभी 55 जिलों में जिला कलेक्टरों के माध्यम से प्रमुख सचिव राजस्व और ईओडब्ल्यू महानिदेशक को ज्ञापन सौंपा जाएगा।

यह मामला केवल एक अधिकारी के खिलाफ दर्ज एफआईआर तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि प्रशासनिक निर्णय लेने वाले अधिकारियों की जवाबदेही और जांच एजेंसियों की कार्रवाई के दायरे पर भी व्यापक बहस खड़ी कर रहा है।

क्या है पूरा मामला?

संघ के अनुसार Balakrishna Makwana के विरुद्ध वर्ष 2019 के एक फौती नामांतरण प्रकरण में Economic Offences Wing Madhya Pradesh (EOW) द्वारा एफआईआर दर्ज की गई थी। आरोप है कि नामांतरण प्रक्रिया में प्रस्तुत जानकारी गलत थी, जिसके आधार पर प्रशासनिक आदेश जारी हुआ।

राजस्व अधिकारी संघ का तर्क है कि यदि किसी आवेदक द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज या तथ्य गलत पाए जाते हैं, तो केवल उस आधार पर संबंधित राजस्व अधिकारी पर आपराधिक मामला दर्ज करना प्रशासनिक कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकता है। संघ का कहना है कि यह कार्रवाई “नियम विरुद्ध” तरीके से की गई।

क्यों बढ़ रहा है विवाद?

राजस्व विभाग भारतीय प्रशासनिक ढांचे का सबसे संवेदनशील हिस्सा माना जाता है। जमीन, नामांतरण, सीमांकन, वारिसान, फौती और भूमि रिकॉर्ड से जुड़े अधिकांश मामलों में तहसीलदार और राजस्व अधिकारियों को निर्णय लेने होते हैं। इन मामलों में दस्तावेजों, स्थानीय जांच और प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर आदेश पारित किए जाते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार समस्या तब उत्पन्न होती है जब बाद में कोई रिकॉर्ड विवादित या गलत पाया जाता है। ऐसे मामलों में यह तय करना जटिल हो जाता है कि:

गलती आवेदक की थी,

दस्तावेज फर्जी थे,

या अधिकारी की भूमिका में लापरवाही अथवा मिलीभगत थी।


यही कारण है कि कई प्रशासनिक संगठनों का मानना है कि बिना स्पष्ट जांच के सीधे आपराधिक प्रकरण दर्ज करने से अधिकारी निर्णय लेने में असहज हो सकते हैं।

संघ का तर्क: “डर के माहौल” में काम करना मुश्किल

संघ के प्रांतीय उपाध्यक्ष और मीडिया प्रभारी Shailendra Sharma ने कहा कि संघ के प्रांताध्यक्ष Dharmendra Singh Chauhan के निर्देश पर यह ज्ञापन अभियान चलाया जा रहा है।

राजस्व अधिकारियों का तर्क है कि यदि प्रत्येक विवादित नामांतरण या रिकॉर्ड त्रुटि पर सीधे आपराधिक कार्रवाई होने लगे, तो अधिकारी फाइलों पर निर्णय लेने से बचने लगेंगे। इससे राजस्व मामलों के निराकरण की गति प्रभावित हो सकती है।

प्रशासनिक विशेषज्ञ इसे “डिसीजन पैरालिसिस” की स्थिति बताते हैं, जहां अधिकारी भविष्य की जांच या मुकदमों के डर से निर्णय लेने में अत्यधिक सतर्क या निष्क्रिय हो जाते हैं।

दूसरी तरफ जवाबदेही का सवाल भी अहम

हालांकि भ्रष्टाचार विरोधी तंत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि भूमि और राजस्व मामलों में अनियमितताओं की शिकायतें लंबे समय से गंभीर चिंता का विषय रही हैं। फर्जी नामांतरण, रिकॉर्ड में हेरफेर और जमीन विवादों में प्रशासनिक मिलीभगत के आरोप कई राज्यों में सामने आते रहे हैं।

ऐसे में जांच एजेंसियों की भूमिका को पूरी तरह कमजोर करना भी उचित नहीं माना जा सकता। विशेषज्ञों का कहना है कि चुनौती “जांच” और “प्रशासनिक संरक्षण” के बीच संतुलन बनाने की है।

यानी यदि अधिकारी ने जानबूझकर गलत आदेश दिया है तो जवाबदेही तय होना जरूरी है, लेकिन यदि वह केवल प्रस्तुत दस्तावेजों के आधार पर कार्य कर रहा था तो जांच प्रक्रिया निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए।

राजस्व प्रशासन पर क्या असर पड़ सकता है?

यह विवाद आने वाले समय में मध्यप्रदेश के राजस्व प्रशासन पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है। विशेष रूप से:

नामांतरण मामलों में जांच प्रक्रिया कठोर हो सकती है

अधिकारियों द्वारा अतिरिक्त दस्तावेज सत्यापन शुरू हो सकता है

लंबित राजस्व प्रकरणों की संख्या बढ़ सकती है

राजस्व अधिकारियों और जांच एजेंसियों के बीच तनाव बढ़ सकता है


विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य सरकार को ऐसे मामलों के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल विकसित करने की आवश्यकता है, जिसमें प्रशासनिक त्रुटि और आपराधिक मंशा के बीच स्पष्ट अंतर निर्धारित किया जा सके।

55 जिलों में एक साथ ज्ञापन क्यों महत्वपूर्ण?

प्रदेश के सभी जिलों में एक साथ ज्ञापन सौंपने की रणनीति यह संकेत देती है कि राजस्व अधिकारी संघ इस मामले को व्यक्तिगत नहीं बल्कि संस्थागत मुद्दे के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है। इससे यह संदेश देने की कोशिश भी है कि फील्ड स्तर पर कार्यरत अधिकारियों में जांच एजेंसियों की कार्रवाई को लेकर असुरक्षा की भावना बढ़ रही है।

अब निगाहें इस बात पर होंगी कि Revenue Department Madhya Pradesh और ईओडब्ल्यू इस विरोध पर क्या रुख अपनाते हैं, तथा क्या सरकार इस मामले में किसी स्तर पर प्रशासनिक समीक्षा या दिशा-निर्देश जारी करती है।

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