भोपाल, । एम्स भोपाल (AIIMS Bhopal) के दो वरिष्ठ शोधकर्ताओं डॉ. सुखेस मुखर्जी और प्रो. जगत राकेश कंवर ने कैंसर चिकित्सा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान देते हुए हाइपोक्सिया और ट्यूमर माइक्रोएन्वायरमेंट पर आधारित एक वैज्ञानिक पुस्तक प्रकाशित की है। यह शोध स्प्रिंगर नेचर, सिंगापुर द्वारा वैश्विक स्तर पर प्रकाशित किया गया है, जो भारत में कैंसर अनुसंधान (Cancer Research India) और बायोमेडिकल साइंस के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
‘Hypoxia and the Tumor Microenvironment: Implications for Cancer Therapy’ पुस्तक का विमोचन
पुस्तक का शीर्षक “Hypoxia and the Tumor Microenvironment: Implications for Cancer Therapy” है, जो कैंसर के उपचार में हाइपोक्सिया (Hypoxia in Cancer Therapy) की जटिल लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करती है। इसका विमोचन एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक प्रो. (डॉ.) अजय सिंह के मार्गदर्शन में संपन्न हुआ, जिनकी अगुवाई में संस्थान शैक्षणिक उत्कृष्टता और अनुसंधान-संवाद की संस्कृति को प्रोत्साहित कर रहा है।
इस अवसर पर प्रो. (डॉ.) शशांक पुरवार, कार्यवाहक चिकित्सा अधीक्षक, भी मौजूद रहे।
कैंसर में हाइपोक्सिया की चुनौतीपूर्ण भूमिका पर गहन शोध
यह पुस्तक बताती है कि कैसे ठोस ट्यूमर (Solid Tumors) में ऑक्सीजन की कमी, जिसे हाइपोक्सिया कहा जाता है, कैंसर की आक्रामकता, उपचार प्रतिरोध और मेटास्टेसिस को बढ़ावा देती है। इस प्रक्रिया के केंद्र में Hypoxia-Inducible Factors (HIFs), विशेषकर HIF-1α, होते हैं जो ट्यूमर के चयापचय, प्रतिरक्षा प्रणाली से बचाव और नई रक्त वाहिकाओं (VEGF Signaling) के निर्माण में अहम भूमिका निभाते हैं।
HIF-1α और कैंसर उपचार में रणनीतियाँ
पुस्तक में HIF-1α की भूमिका को विस्तार से समझाया गया है कि वह कैसे लैक्टेट उत्पादन, एसिडिक ट्यूमर एन्वायरमेंट, और T-cell suppression को प्रेरित करता है, जिससे इम्यूनोथेरेपी कम प्रभावी हो जाती है।
लेखकों ने बताया कि कैसे Tumor-Associated Macrophages (TAMs) और Myeloid-Derived Suppressor Cells (MDSCs) जैसे प्रतिरक्षा-कोशिकाएँ हाइपोक्सिक एन्वायरमेंट में इकट्ठा होकर कैंसर प्रतिरोध को बढ़ाते हैं।
नवीन चिकित्सा दृष्टिकोण और संभावनाएँ
शोध में HIF-1α Inhibitors (जैसे PT2385), Hypoxia-Activated Prodrugs (जैसे Evofosfamide) और Anti-Angiogenic Agents (जैसे Bevacizumab) जैसी आधुनिक दवाओं पर चर्चा की गई है। इसके अतिरिक्त, पुस्तक में इम्यूनोथेरेपी और रेडियोथेरेपी के साथ इन दवाओं के संयोजन की उपयोगिता को भी रेखांकित किया गया है।
भविष्य की दिशा: हाइपोक्सिक-ट्यूमर की पहचान और उपचार का अनुकूलन
लेखकों ने ट्यूमर की विविधता और हाइपोक्सिया की गतिशीलता को सबसे बड़ी चुनौती बताया है। समाधान के तौर पर उन्होंने Spatial Transcriptomics जैसी एडवांस तकनीकों की आवश्यकता को रेखांकित किया है, जिससे हाइपोक्सिक जोन की सटीक पहचान संभव हो सके। साथ ही, COL5A1 और FN1 जैसे जीन को संभावित हाइपोक्सिक-बायोमार्कर के रूप में सुझाया है।
एम्स भोपाल के वैज्ञानिकों ने कैंसर में ‘हाइपोक्सिया’ की भूमिका पर किया उच्चस्तरीय शोध, स्प्रिंगर नेचर से प्रकाशित हुई अंतरराष्ट्रीय पुस्तक
