चंद्रकांति आर्य
सड़क सुरक्षा आज केवल यातायात व्यवस्था का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह एक गंभीर सामाजिक, मानवीय और नैतिक चुनौती बन चुकी है। देश में प्रतिदिन होने वाले सड़क हादसे यह स्पष्ट संकेत देते हैं कि समस्या केवल सड़कों की गुणवत्ता या कानूनों की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके मूल में नागरिकों की लापरवाही, नियमों के प्रति उदासीनता और जिम्मेदारी के अभाव की भूमिका कहीं अधिक है। सरकार सड़कों का निर्माण करती है, यातायात नियम निर्धारित करती है और प्रवर्तन की व्यवस्था भी करती है, किंतु जब नागरिक ही नियमों का पालन नहीं करते, तब दुर्घटनाएँ अनिवार्य हो जाती हैं।
अक्सर देखा जाता है कि लोग बिना वैध ड्राइविंग लाइसेंस वाहन चलाते हैं, हेलमेट और सीट बेल्ट को अनावश्यक समझते हैं तथा तेज रफ्तार, गलत दिशा में वाहन चलाने और रेडलाइट तोड़ने जैसी आदतों को अपनी चतुराई मान लेते हैं। इस लापरवाही का दुष्परिणाम केवल वाहन चालक तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अनेक बार निर्दोष राहगीरों, बच्चों और पूरे परिवारों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। क्षणिक लाभ या दूसरों से आगे निकलने की मानसिकता कई बार जीवनभर का पछतावा बन जाती है।
*हर घंटे औसतन 56 सड़क दुर्घटनाएँ :*
सड़क सुरक्षा आज हमारे सामने एक विकट सामाजिक-मानवीय संकट के रूप में उपस्थित है। देश में हर घंटे औसतन 56 सड़क दुर्घटनाएँ होती हैं और हर चार मिनट में एक व्यक्ति की मौत सड़क हादसे में हो जाती है। वर्ष 2025 के ताजा आँकड़े इस संकट की गंभीरता को और बढ़ाते हैं। इस वर्ष सड़क दुर्घटनाओं में मृत्यु का आँकड़ा 1,65,000 को पार कर गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 3.1 फीसदी की वृद्धि दर्शाता है। ये आँकड़े केवल संख्याएँ नहीं, बल्कि हमारे सामूहिक अनुशासनहीनता के जीवंत दस्तावेज हैं।
इनमें सबसे अधिक मौतें 18 से 45 वर्ष की आयु के युवाओं की हुईं, जो देश की कार्यशील और भविष्य की रीढ़ मानी जाती है। 18-45 वर्ष के युवाओं की मृत्यु दर अब भी 73 फीसदी बनी हुई है। विशेष रूप से चिंताजनक यह है कि 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों द्वारा वाहन चलाने के कारण हुई दुर्घटनाओं में 10 फीसदी की वृद्धि हुई है, जो अभिभावकों की लापरवाही और प्रवर्तन तंत्र में कमी को दर्शाता है। यह तथ्य समाज और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए अत्यंत चिंताजनक है। पिछले वर्ष 25 फीसदी की वृद्धि दर्ज करने के बाद, 2025 में इलेक्ट्रिक दुपहिया वाहनों (विशेषकर ई-स्कूटर) से जुड़ी गंभीर दुर्घटनाओं में 40 फीसदी की अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज हुई है। इनमें से अधिकांश मामले बैटरी आग, वाहन की अचानक ब्रेक विफलता और अनियंत्रित उच्च गति से जुड़े हैं। यह एक नई चुनौती है जिसके लिए तत्काल नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता है। हिट-एंड-रन के मामलों में 15 फीसदी की वृद्धि ने सामाजिक नैतिकता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाए हैं। अनुमान है कि हर पाँच गंभीर दुर्घटनाओं में से एक हिट-एंड-रन है। लगभग 35 फीसदी दुर्घटनाओं में खराब सड़क स्थितियाँ (गड्ढे, अस्पष्ट चिह्न, अपर्याप्त रोशनी) एक प्रमुख कारक रहीं। मानसून के बाद के महीनों में यह आँकड़ा 50 फीसदी तक पहुँच गया।
दुर्घटनाओं के प्रमुख कारणों में ओवरस्पीडिंग सबसे आगे है, जिसके कारण कुल मौतों का लगभग 68 प्रतिशत हिस्सा दर्ज किया गया। इसके अतिरिक्त नशे में वाहन चलाना, मोबाइल फोन का उपयोग करते हुए ड्राइविंग, रेडलाइट जंप और गलत दिशा में वाहन चलाना भी प्रमुख कारण हैं। हादसों में सबसे अधिक प्रभावित वर्ग दुपहिया वाहन चालक और पैदल यात्री हैं, जो सड़क पर सबसे अधिक असुरक्षित होते हैं। राज्य स्तर पर देखें तो उत्तर प्रदेश में सड़क हादसों से होने वाली मौतों की संख्या सबसे अधिक रही, जबकि तमिलनाडु लगातार सड़क दुर्घटनाओं की संख्या में पहले स्थान पर बना हुआ है। मध्यप्रदेश दुर्घटनाओं की संख्या में देश में दूसरे और मौतों के मामले में चौथे स्थान पर है। यह स्थिति यह दर्शाती है कि सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में अभी ठोस और सामूहिक प्रयासों की अत्यंत आवश्यकता है।
*स्वयं व दूसरों की सुरक्षा को अपनी जिम्मेदारी समझें*
स्थिति को और गंभीर बनाता है यह तथ्य कि बड़ी संख्या में मौतें ऐसे लोगों की हुईं जिनके पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था या जो पुराने और असुरक्षित वाहनों में यात्रा कर रहे थे। सड़कों पर गड्ढों, ओवरलोडेड वाहनों और हिट-एंड-रन की घटनाओं में भी निरंतर वृद्धि देखी गई है, जो प्रशासनिक जवाबदेही के साथ-साथ नागरिक जागरूकता की कमी को भी उजागर करती है।
सड़क सुरक्षा केवल कानून का विषय नहीं, बल्कि नागरिक कर्तव्य का प्रश्न है। अधिकारों की अपेक्षा करने वाले नागरिकों को यह भी समझना होगा कि कर्तव्यों की अनदेखी अंततः उन्हीं के अधिकारों को छीन लेती है। चाहे व्यक्ति वाहन चला रहा हो या पैदल चल रहा हो, सड़क नियमों का पालन करना हर नागरिक का दायित्व है, क्योंकि ये नियम किसी दंड के लिए नहीं, बल्कि जीवन की सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं।
यह स्पष्ट है कि ईश्वर प्रदत्त जीवन अमूल्य है और इसकी रक्षा करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। सड़क सुरक्षा की सफलता केवल सरकारी प्रयासों से नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की सजगता, अनुशासन और संवेदनशीलता से संभव है। यदि हम नियमों का पालन करें, संयमित व्यवहार अपनाएँ और दूसरों की सुरक्षा को भी अपनी जिम्मेदारी समझें, तभी सड़कों पर होने वाली यह मूक त्रासदी रोकी जा सकती है। सड़क पर सावधानी ही सुरक्षा की सबसे बड़ी गारंटी है।
*(लेखिका साहित्यकार एवं समसामयिक मुद्दों पर लिखती हैं)*
सड़क सुरक्षा : सरकार की जवाबदारी और हमारी जिम्मेदारी
