भोपाल में आयोजित कृषि एवं संबद्ध विभागों की समीक्षा बैठक ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले वर्षों में खेती का स्वरूप तेजी से बदलने वाला है। अब किसान केवल खेत जोतने और फसल उगाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि तकनीक, डेटा, बाजार और वैल्यू एडिशन से जुड़ा “एग्री-उद्यमी” बनने की दिशा में आगे बढ़ेगा।
जिले स्तर पर प्रशासन द्वारा डिजिटल कृषि, कृषि ड्रोन, फार्मर आईडी, एग्री-स्टैक, प्राकृतिक खेती और मिलेट्स आधारित फसल विविधीकरण पर दिया गया जोर इसी परिवर्तन का संकेत माना जा रहा है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव?
भारत की कृषि लंबे समय से तीन बड़ी चुनौतियों से जूझ रही है — बढ़ती लागत, घटती मिट्टी की गुणवत्ता और बाजार में अस्थिर कीमतें। मध्यप्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्य में यह संकट और गहरा हो जाता है, क्योंकि यहां बड़ी संख्या में छोटे और सीमांत किसान हैं।
ऐसे समय में प्रशासन का फोकस केवल उत्पादन बढ़ाने के बजाय “कृषि आय बढ़ाने” पर जाना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यही वजह है कि बैठक में कृषि विभाग के साथ उद्यानिकी, पशुपालन, मत्स्य पालन, नाबार्ड और किसान उत्पादक संगठनों (FPO) को एक मंच पर लाया गया।
विशेषज्ञ मानते हैं कि खेती अब अकेले खेत की गतिविधि नहीं रही। इसे सप्लाई चेन, प्रोसेसिंग, स्टोरेज, डिजिटल प्लेटफॉर्म और बाजार नेटवर्क से जोड़ना जरूरी हो गया है।
ड्रोन और डिजिटल कृषि: गांवों में शुरू हो रही नई क्रांति
बैठक में कृषि यंत्रों और ड्रोन को जे-फार्म एप पर पंजीकृत करने पर विशेष जोर दिया गया। पहली नजर में यह सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया लग सकती है, लेकिन इसका असर आने वाले समय में ग्रामीण कृषि अर्थव्यवस्था पर दिखाई देगा।
ड्रोन आधारित खेती से:
– कीटनाशक और उर्वरक का सटीक छिड़काव संभव होगा
– पानी की बचत होगी
– श्रम लागत कम होगी
– फसल रोगों की पहचान जल्दी हो सकेगी
– बड़े खेतों की निगरानी आसान बनेगी
सरकार एग्री-स्टैक और फार्मर आईडी के जरिए किसानों का डिजिटल डेटाबेस तैयार कर रही है। भविष्य में यही डेटा बीमा, ऋण, सब्सिडी और बाजार कनेक्टिविटी का आधार बनेगा।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि डिजिटल कृषि की सफलता इंटरनेट कनेक्टिविटी, स्थानीय प्रशिक्षण और तकनीकी जागरूकता पर निर्भर करेगी। यदि छोटे किसान तकनीक तक नहीं पहुंच पाए, तो डिजिटल विभाजन बढ़ सकता है।
नरवाई जलाने पर सख्ती का असली कारण
बैठक में स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम (SMS) के बिना कंबाइन हार्वेस्टर संचालन पर कार्रवाई की चेतावनी दी गई। इसका सीधा संबंध पर्यावरण और मिट्टी की सेहत से है।
नरवाई जलाने से:
– मिट्टी के उपयोगी सूक्ष्मजीव नष्ट होते हैं
– कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है
– खेत की नमी कम होती है
– दीर्घकाल में उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है
पिछले कुछ वर्षों में उत्तर भारत में पराली और नरवाई जलाने को लेकर गंभीर पर्यावरणीय बहस हुई है। अब मध्यप्रदेश भी इस मुद्दे को केवल प्रदूषण नहीं, बल्कि “मृदा संरक्षण” के नजरिए से देखने लगा है।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसानों को मशीनरी, बायो-डीकंपोजर और वैकल्पिक उपयोग की सुविधाएं मिलें, तो नरवाई प्रबंधन ग्रामीण उद्योग का नया क्षेत्र बन सकता है।
मिलेट्स और देसी अनाज पर बढ़ता फोकस
बैठक में दलहन, तिलहन और मिलेट फसलों का रकबा बढ़ाने की रणनीति पर विशेष बल दिया गया। इसके पीछे केवल पोषण का मुद्दा नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन से जुड़ी बड़ी चिंता भी है।
मिलेट्स:
– कम पानी में तैयार हो जाते हैं
– सूखा प्रभावित क्षेत्रों में बेहतर उत्पादन देते हैं
– मिट्टी पर कम दबाव डालते हैं
– अंतरराष्ट्रीय बाजार में इनकी मांग बढ़ रही है
संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2023 को “इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स” घोषित किए जाने के बाद भारत में मोटे अनाज को लेकर नई नीतिगत सक्रियता देखी गई है। मध्यप्रदेश इसे कृषि निर्यात और पोषण सुरक्षा दोनों के अवसर के रूप में देख रहा है।
प्राकृतिक खेती अब वैकल्पिक प्रयोग नहीं रही
कभी सीमित किसान समूहों तक रहने वाली प्राकृतिक खेती अब सरकारी रणनीति का हिस्सा बनती दिखाई दे रही है। चयनित क्लस्टरों में बायो-रिसोर्स सेंटर स्थापित करने की योजना बताती है कि प्रशासन रासायनिक लागत कम करने और स्थानीय संसाधनों आधारित खेती को बढ़ावा देना चाहता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्राकृतिक खेती तभी सफल होगी जब:
– किसानों को बाजार में प्रीमियम मूल्य मिले
– प्रमाणन प्रक्रिया सरल हो
– प्रोसेसिंग और ब्रांडिंग की सुविधा उपलब्ध हो
इसी कारण स्थानीय फसलों और देशी अनाजों के लिए GI टैग की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई। यदि किसी स्थानीय उत्पाद को GI टैग मिलता है, तो उसकी बाजार पहचान और मूल्य दोनों बढ़ सकते हैं।
माइक्रो कोल्ड स्टोरेज और FPO मॉडल क्यों जरूरी
खेती में सबसे बड़ा नुकसान केवल उत्पादन कम होने से नहीं, बल्कि भंडारण और बाजार की कमजोर व्यवस्था से होता है। ग्रामीण स्तर पर माइक्रो कोल्ड स्टोरेज विकसित करने की योजना छोटे किसानों के लिए बड़ा बदलाव ला सकती है।
इससे:
– किसानों को फसल तुरंत बेचने की मजबूरी कम होगी
– सब्जी और फल उत्पादकों को बेहतर दाम मिल सकते हैं
– बर्बादी घटेगी
– ग्रामीण क्षेत्रों में एग्री-बिजनेस बढ़ सकता है
इसी तरह किसान उत्पादक संगठन (FPO) छोटे किसानों को सामूहिक ताकत देते हैं। सरकार अब इन्हें कृषि सुधारों की रीढ़ मान रही है।
आने वाले समय में क्या बदल सकता है?
भोपाल में हुई यह समीक्षा बैठक संकेत देती है that मध्यप्रदेश अब पारंपरिक कृषि मॉडल से “स्मार्ट और टिकाऊ कृषि” की ओर बढ़ रहा है। आने वाले वर्षों में खेती में डेटा, ड्रोन, डिजिटल प्लेटफॉर्म और बाजार विश्लेषण की भूमिका तेजी से बढ़ेगी।
लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि इन योजनाओं का लाभ गांव के छोटे किसान तक कितनी पारदर्शिता और प्रभावशीलता से पहुंचता है। यदि तकनीक, प्रशिक्षण और बाजार सुधार एक साथ लागू हुए, तो मध्यप्रदेश कृषि नवाचार के राष्ट्रीय मॉडल के रूप में उभर सकता है।
कृषि क्षेत्र अब केवल खाद्यान्न उत्पादन का विषय नहीं रह गया है। यह रोजगार, जल संरक्षण, पर्यावरण सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के भविष्य से सीधे जुड़ा हुआ मुद्दा बन चुका है।
मध्यप्रदेश में खेती का नया मॉडल: ड्रोन, डेटा और देसी अनाज के सहारे बदलने की तैयारी
