जबलपुर। जबलपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) के सीईओ दीपक वैद्य और अन्य अधिकारियों के खिलाफ आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) द्वारा घोटाले का मामला दर्ज होने के बाद भी अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। इस प्रकरण ने न केवल भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों को उजागर किया है, बल्कि प्रशासन की पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या है मामला?
जेडीए पर आरोप है कि उसने कछपुरा क्षेत्र में योजना क्रमांक 6 और 41 की अधिग्रहित जमीन के दस्तावेजों में हेरफेर कर सरकार को 2.40 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाया। इसके साथ ही 25 लाख रुपये की स्टांप ड्यूटी भी बचाई गई।
ईओडब्ल्यू की जांच के अनुसार, जेडीए ने अधिग्रहित जमीन के बदले भू-स्वामियों को 2.50 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया था, लेकिन दस्तावेज़ अपने नाम नहीं करवा पाए। इस दौरान विद्याबाई प्यासी और उनके बेटों ने जेडीए अधिकारियों के साथ मिलकर फर्जी दस्तावेज तैयार किए और जमीन को बेच दिया।
ईओडब्ल्यू जांच में खुलासे
जांच के दौरान जेडीए सीईओ दीपक वैद्य ने ईओडब्ल्यू को गलत जानकारियां दीं। इस मामले में तत्कालीन भू-अर्जन अधिकारी और राजस्व अधिकारियों की भूमिका भी शक के घेरे में है। जांच एजेंसी का कहना है कि दोषी पाए जाने पर अन्य अधिकारियों को भी आरोपी बनाया जा सकता है।
सरकार और विभाग की चुप्पी पर उठ रहे सवाल
घोटाले के खुलासे के बाद भी सरकार या संबंधित विभाग की ओर से अब तक कोई स्पष्ट बयान नहीं आया है। इस चुप्पी से आम जनता में यह सवाल उठ रहा है:
1. क्या इस मामले में राजनीतिक दखल है?
2. क्या भ्रष्टाचार को दबाने की कोशिश की जा रही है?
3. क्या सरकार की भ्रष्टाचार विरोधी नीतियां केवल कागजों तक सीमित हैं?
पीड़ित किसान न्याय के लिए भटक रहे
इस घोटाले से प्रभावित किसानों का कहना है कि वे अपने हक के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। अशोक प्यासी की शिकायत पर यह मामला उजागर हुआ, लेकिन दोषियों पर अब तक कोई सख्त कार्रवाई नहीं हुई है।
जबलपुर में दहशत का माहौल
घोटाले के कारण शहर में प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़े हो गए हैं। स्थानीय लोग सरकार से पारदर्शी जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
जबलपुर विकास प्राधिकरण घोटाला: सीईओ पर आर्थिक अपराध, लेकिन कार्रवाई अब भी अधूरी
